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26 Mar 2026

घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रचंड प्रयोग

🏠 घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रचंड प्रयोग – बजरंग बाण से जल को करें अभिमंत्रित 🏠



नमस्ते दोस्तों,


अक्सर हम महसूस करते हैं कि घर में बिना वजह के वाद-विवाद बढ़ रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं। माहौल तनावपूर्ण रहता है। बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्ग परेशान रहते हैं। कोई बड़ी वजह नहीं होती, फिर भी घर में कलह बढ़ती जाती है। नकारात्मकता ऐसे घर कर जाती है जैसे हवा में घुल गई हो।


हम समझ नहीं पाते कि आखिर हो क्या रहा है। हम सोचते हैं – लोगों का स्वभाव खराब हो गया, या समय खराब चल रहा है, या कोई ग्रह दोष है। पर असल में यह सब नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होता है। जो घर में बिना बुलाए आ जाती है और धीरे-धीरे पूरे वातावरण को जहरीला बना देती है।


आज मैं आपको एक ऐसा प्रयोग बताने जा रहा हूँ जो बेहद सरल है, लेकिन इसका प्रभाव प्रचंड है। यह प्रयोग उन सभी घरों के लिए है जहाँ शांति लौटानी हो, जहाँ नकारात्मकता को जड़ से उखाड़ फेंकना हो।



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🔱 यह प्रयोग क्यों काम करता है?


बजरंग बाण हनुमान जी का वह स्तोत्र है जो स्वयं तुलसीदास जी ने रचा था। यह कोई साधारण स्तोत्र नहीं है। इसमें हनुमान जी की वह शक्ति समाई है जो रावण के लंका को जलाकर राख कर सकती है। जो समुद्र को लाँघ सकती है। जो संजीवनी बूटी ला सकती है। जो हर संकट को पल भर में दूर कर सकती है।


जब इस स्तोत्र की ऊर्जा को जल में स्थापित किया जाता है, तो वह जल उसी शक्ति से भर जाता है। और जब वह जल पूरे घर में छिड़का जाता है, तो हर उस नकारात्मक ऊर्जा को, हर उस तनाव को, हर उस कलह को जड़ से समाप्त कर देता है।


📿 पूरी विधि – स्टेप बाय स्टेप


पहला कदम – सामग्री इकट्ठा करें


इस प्रयोग के लिए आपको चाहिए –


✦ एक लोटा – मिट्टी का, तांबे का, या पीतल का

✦ एक कुशा – यह किसी भी मंदिर या पूजा की दुकान पर मिल जाता है

✦ बजरंग बाण का पाठ – 11 बार

✦ लाल आसन – बैठने के लिए


दूसरा कदम – जल को तैयार करें


एक लोटे में साफ पानी लें। उसमें एक कुशा डाल दें। कुशा पवित्रता का प्रतीक है। यह जल को और अधिक सात्विक बनाता है और ऊर्जा को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है।


तीसरा कदम – संकल्प लें


अब लोटे को अपने हाथों में लें। आँखें बंद करें और मन ही मन संकल्प लें –


"मैं संकल्प लेता हूँ कि इस लोटे के जल में मेरे द्वारा पढ़े जाने वाले बजरंग बाण की ऊर्जा स्थापित हो। यह जल प्रचंड होकर मेरे घर की सारी नकारात्मकता को नष्ट करे। घर में शांति स्थापित करे। मेरे परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़े।"


चौथा कदम – बजरंग बाण का पाठ करें


अब लाल आसन पर बैठ जाएँ। सामने हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति रखें। फिर 11 बार बजरंग बाण का पाठ करें।


पाठ करते समय ध्यान रखें कि आप जल को अभिमंत्रित कर रहे हैं। हर बार पाठ करने के बाद महसूस करें कि बजरंग बाण की ऊर्जा उस जल में उतर रही है। हर बार ऐसा लगे जैसे कोई प्रचंड शक्ति उस पानी में समा रही हो।


पाँचवाँ कदम – जल को घर में छिड़कें


जब 11 पाठ पूरे हो जाएँ, तो अब वह जल अभिमंत्रित हो चुका है। अब इसे पूरे घर में छिड़कें।


✦ पहले घर के मुख्य द्वार पर छिड़कें

✦ फिर हर कमरे में – एक-एक कोने में

✦ विशेष रूप से उन जगहों पर जहाँ अधिकतर झगड़े होते हैं, जहाँ तनाव रहता है

✦ घर के पूजा स्थान पर भी छिड़कें

✦ अंत में थोड़ा जल नहाने के पानी में मिला दें


छठा कदम – निरंतरता


इस प्रयोग को आप एक बार भी कर सकते हैं। लेकिन अगर घर में नकारात्मकता बहुत अधिक है, तो इसे लगातार 7 दिन या 11 दिन तक करें। हर दिन नया जल लें, नया कुशा डालें, और 11 बार बजरंग बाण पढ़कर जल अभिमंत्रित करें। फिर पूरे घर में छिड़कें।


💫 इस प्रयोग का प्रभाव


जब आप यह प्रयोग करेंगे, तो धीरे-धीरे आपको परिवर्तन दिखने लगेगा –


✦ पहले तो घर का माहौल हल्का होने लगेगा। जैसे कोई भारीपन हट गया हो।


✦ फिर छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े कम होने लगेंगे। लोग एक-दूसरे को समझने लगेंगे।


✦ घर में शांति छाने लगेगी। जैसे हर कोने में सुकून बिखर गया हो।


✦ बच्चे शांत रहने लगेंगे। बड़ों का मन हल्का रहेगा।


✦ पूजा स्थान की ऊर्जा भी शुद्ध होगी। घर में सकारात्मकता का प्रवाह शुरू होगा।


🌿 कुछ बातें याद रखें


✦ यह प्रयोग किसी के खिलाफ नहीं है। यह सिर्फ घर की नकारात्मक ऊर्जा को शुद्ध करने के लिए है।


✦ बजरंग बाण का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। जल को अभिमंत्रित कर रहे हैं, यह भाव रखें।


✦ यदि पूरा बजरंग बाण पढ़ना संभव न हो, तो हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ भी कर सकते हैं। लेकिन बजरंग बाण का प्रभाव अधिक प्रचंड होता है।


✦ इस प्रयोग के बाद घर में सकारात्मकता बनी रहे, इसके लिए प्रतिदिन कम से कम एक बार हनुमान चालीसा का पाठ करें।


🔥 एक गहरी बात


दोस्तों, घर की नकारात्मकता कोई बाहरी चीज नहीं होती। वह हमारे भीतर के तनाव, चिड़चिड़ापन, अधीरता से पैदा होती है। और फिर वह घर के हर कोने में फैल जाती है। बजरंग बाण की ऊर्जा उस नकारात्मकता को जड़ से उखाड़ फेंकती है। यही कारण है कि जब हम यह प्रयोग करते हैं, तो सिर्फ घर ही शांत नहीं होता, हमारा मन भी शांत होता है।



🙏 हनुमान जी की कृपा से घर में शांति और सकारात्मकता का वास हो 🙏


👇 क्या आपने कभी घर की नकारात्मकता दूर करने के लिए यह प्रयोग किया है? 


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17 Mar 2026

साधना क्या है भैरवी साधना #रहस्य भैरवी#चक्र साधना विधि

 #भैरवी #साधना क्या है भैरवी साधना #रहस्य भैरवी #चक्र साधना विधि  


https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE


#ब्रह्मांड में छिपी हुई तमाम प्रकार की शक्तियों को जानने और उन्हें प्राप्त करने के लिए अनेकों प्रकार के मार्ग वर्णित किए गए हैं इन शक्तियों को प्राप्त करने और जानने के लिए तंत्र मंत्र यंत्र भक्ति उपासना आराधना साधना आदि का उपयोग किया जाता है। 


https://youtube.com/@user-er1yu6br9z


किसी भी प्रकार की साधना करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग सोचते हैं समझते हैं दरअसल सभी प्रकार की साधनों में कहीं ना कहीं कठिनाई जरूर दिखाई देती है साधना ओं के दौरान व्यक्ति को अपने में काबू रखना जरूरी होता है तभी उसकी साधना सिद्ध हो सकती है।


https://youtu.be/_n0ECnDnLls


भैरवी साधना क्या है भैरवी साधना रहस्य भैरवी चक्र साधना विधि  


हमारी तंत्र मंत्र की साधनाओं में अनेकों प्रकार की विद्या भी सम्मिलित होती है और इन विद्याओं को सिद्ध करने के लिए मार्ग भी प्रशस्त किए गए हैं तंत्र-मंत्र और यंत्र की दुनिया में बहुत सारी महाविद्याए भी सम्मिलित की गई हैं जिनके अंतर्गत भैरवी साधना की विद्या की सम्मिलित हुई है।


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


तंत्र साधना में भैरवी साधना 10 महाविद्याओं में एक विद्या है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है भैरवी साधना करने से व्यक्ति के अंदर ब्रह्मांड में छिपी हुई अनेकों महा शक्तियों के विषय में व्यक्ति भी जानकार हो जाता है और वह एक प्रकार का त्रिकालदर्शी पुरुष या सिद्ध पुरुष बन जाता है।


https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y


भैरवी साधना या भैरवी पूजा एक ऐसी साधना का पूजा है जिसके माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री वासना के लिए नहीं बल्कि सत्य का एक उद्गम स्थान भी है यदि कोई भी व्यक्ति भैरवी साधना करना चाहता है तो उसको कोई योग गुरु है सिखा सकता है।


https://youtu.be/-_w_g7_08jU


भैरवी साधना दसमहाविद्या में माता भैरवी और भैरव भगवान शिव और पार्वती के रूप होते हैं अर्थात भगवान शिव के भैरव और पार्वती के भैरवी रूप की साधना ही भैरवी साधना कहलाती है।


 

भैरवी साधना का रहस्य क्या है ?


भैरवी साधना के वाममार्गी शाखा में देह को साधना को आधार मानकर तंत्र साधना की जाती है हमारे शरीर में स्थित देवताओं की संपूर्ण शक्तियां जिस ऊर्जा के साथ होती हैं उन को जागृत करने के लिए साधना प्रथम चरण होता है उसे भगवान के द्वारा प्राप्त शरीर से भगवान की शक्तियों को जाना जाता है.


हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के संस्कारों और अनेक वासनाओं का होना पाया जाता है

भैरवी साधना के अंतर्गत शरीर में जितनी भी वासनाएं होती हैं उन्हें निर्वस्त्र होकर शरीर से बाहर किया जाता है।


भैरवी साधना का मुख्य उद्देश्य क्या है ?


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी साधना का प्रमुख उद्देश्य हमारे शरीर में स्थित काम ऊर्जा की शक्ति के द्वारा संसार को विस्मृत करके परम आनंद की अनुभूति करना है भैरवी साधना कई चरणों में संपन्न होती है.


भैरवी साधना के चरण क्या है ?


भैरवी साधना को कई चरणों में सिद्ध करने की प्रक्रिया है क्योंकि यह साधना स्त्री और पुरुष दोनों के सानिध्य में होती हैं या कोई पुरुष और स्त्री अकेले भी करता है ऐसे में साधना के कई चरण हो जाते हैं।


1. भैरवी साधना का पहला चरण


भैरवी साधना के पहले चरण में स्त्री पुरुष जो भी साधक हैं उनको एकांत और सुगंधित वातावरण में निर्वस्त्र होकर आमने-सामने कम से कम 3 फुट की दूरी पर सुखासन या पद्मासन लगाकर बैठे और एक दूसरे की ओर आंखों में देखते हुए मंत्र जाप करें.


इस प्रकार की साधना के दौरान साधक के अंदर धीरे धीरे निरंतर काम भाव ऊर्ध्वगामी होकर दिव्य ऊर्जा के रूप में सहस्त्रदल का भेदन कर देता है।


2. भैरवी साधना का दूसरा चरण 


भैरवी साधना का दूसरा चरण स्त्री पुरुष जो साधक हैं एक दूसरे के करीब आकर अंग प्रत्यंगो को स्पर्श करते हुए उत्तेजित काम भावना को स्थाई बनाते हैं।


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


साधना के दौरान बीच-बीच में मंत्रों का उच्चारण करते रहने से कामोत्तेजना की बाहरी क्रियाओं को करना होता है परंतु काम उत्तेजना के दौरान स्खलन होने को रोकते हुए आत्म संयम रखें


3. भैरवी साधना का अंतिम चरण 


भैरवी साधना के अंतिम चरण में साधक स्त्री या पुरुष परस्पर संभोग की क्रिया करते हैं परंतु समान भाव समान श्रद्धा और उत्साह तथा संयम से शारीरिक भूख थी साधना करते हैं। ना कि इस चरण में साधक स्त्री पुरुष निसंकोच होकर संभोग की क्रिया मंत्र जाप करते हुए करें।


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


साधना के दौरान जब संभोग किया कर रहे हैं तो आप संयम रखते हुए प्रयास करें कि दोनों का इस खनन एक साथ हो यदि एक साथ नहीं हो रहा है तो लगभग एक साथ संपन्न हो।


भैरवी साधना की विधि | 


भैरवी साधना करने के लिए साधक को नवरात्रि के दिनों में शुक्ल पक्ष के सोमवार या शुक्रवार से प्रारंभ करना चाहिए। इसके अलावा इस साधना को करने के लिए रात्रि के 9 बजे के बाद समय ज्यादा उचित है।


साधना में लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर अपनी पूजा कक्ष या एकांत स्थान पर पूर्व की ओर मुंह करके बैठे। उसके बाद अपने सामने लाल आसन पर एक चौकी बनाएं और उस पर भगवान शिव तथा अपने गुरु का फोटो लगाएं इसके बाद रोली से कमला यंत्र स्थापित करें घी का दीपक जलाकर यंत्र की पूजा अर्चना करें। पूजा अर्चना करने के बाद क्रमशः संकल्प नियोग करें।


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी साधना के दौरान संकल्प विनियोग किस प्रकार से पढ़े ?


भैरवी साधना के दौरान संकल्प विनियोग पढ़ना जरूरी है अतः ऐसे में आप भैरवी साधना के संकल्प


 विनियोग इस प्रकार से पढ़ें.


ॐ अस्य श्री त्रिपुर भैरवी मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि: पंक्तिश्छ्न्द: त्रिपुर भैरवी देवता वाग्भवो बीजं शक्ति बीजं शक्ति: कामराज कीलकं श्रीत्रिपुरभैरवी प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:


1. ऋष्यादि न्यास


इस संकलन में बाएं हाथ से जल लेकर दाहिने हाथ से संबंध पांचों उंगलियों से नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करते हुए अंगों को स्पर्श करें


दक्षिणामूर्तये ऋषये नम: शिरसि ( सर को स्पर्श करें )

पंक्तिच्छ्न्दे नम: मुखे ( मुख को स्पर्श करें )

श्रीत्रिपुरभैरवीदेवतायै नम: ह्रदये ( ह्रदय को स्पर्श करें )

वाग्भवबीजाय नम: गुहे ( गुप्तांग को स्पर्श करें )

शक्तिबीजशक्तये नम: पादयो: ( दोनों पैरों को स्पर्श करें )

कामराजकीलकाय नम: नाभौ ( नाभि को स्पर्श करें )

विनियोगाय नम: सर्वांगे ( पूरे शरीर को स्पर्श करें )


2. कर न्यास 


अपने दोनों हाथों के अंगूठे से हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करते हुए चेतना को प्राप्त करें और यह मंत्र जाप करें


हस्त्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।

ह्स्त्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।

हस्त्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।

हस्त्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।


3. ह्र्दयादि न्यास


हस्त्रां ह्रदयाय नम: ।

हस्त्रां शिरसे स्वाहा ।

ह्स्त्रूं शिखायै वषट् ।

हस्त्रां कवचाय हुम् ।

ह्स्त्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

हस्त्र: अस्त्राय फट् ।


भैरवी की पूजा कैसे करें ? 

 


उधदभानुसहस्त्रकान्तिमरूणक्षौमां शिरोमालिकां,

रक्तालिप्रपयोधरां जपवटी विद्यामभीतिं परम् ।

हस्ताब्जैर्दधतीं भिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं,

देवी बद्धहिमांशुरत्नस्त्रकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ।।


भैरवी ध्यान


हं हं हं हंस हंसी स्मित कह कह चामुक्त घोर अट्टहासा।


खं खं खं खड्गहस्ते त्रिभुवन निलये कालभैरवी कालधारी।।


रं रं रं रंगरंगी प्रमुदित वदने पिर्घैंकेषी श्मशाने।

यं रं लं तापनीये भ्रकुटि घट घटाटोप, टंकार जापे।।


हं हं हंकारनादं नर पिषितमुखी संधिनी साध्रदेवी।

ह्रीं ह्रीं ह्रीं कुष्माण्ड मुण्डी वर वर ज्वालिनी पिंगकेषी कृषांगी।।


खं खं खं भूत नाथे किलि किलि किलिके एहि एहि प्रचण्डे।


ह्रुम ह्रुम ह्रुम भूतनाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते।।

भां भां भां भावैर्भय हन हनितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री।


भीं भीं भीं भीमकाक्षिर्गुण गुणित गुहावास भोगी सभोगी।।


भूं भूं भूं भूमिकम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे।

भें भें भें भेदनीये हरतु मम भयं भैरव्ये त्वां नमस्ते।।


हां हां हाकिनी स्वरूपिणी भैरवी क्षेत्रपालिनी।

कां कां कां कानिनी स्वरूपा भैरवी व्याधिनाशिनी।।


रां रां रां राकिनी स्वरूपा भैरवी शत्रुमर्द्दिनी।

लां लां लां लाकिनी स्वरूपा भैरवी दुःख दारिद्रनाषिनी।।


भैं भैं भैं भ्रदकालिके क्रूर ग्रह बाधा निवारिणी।

फ्रैं फ्रैं फ्रैं नवनाथात्मिके गूढ़ ज्ञानप्रदायिनि।।


ईं ईं ईं रूद्रभैरवी स्वरूपा रूद्रग्रंथिभेदिनि।

उं उं उं विश्णुवामांगे स्थिता विष्णु ग्रंथि भेदिनी।


च्लूं च्लूं च्लूं नीलपताके सर्वसिद्धि प्रदायिनी ।

अं अं अं अंतरिक्षे सर्वदानव ग्रह बंधिनी।।


स्त्रां स्त्रां स्त्रां सप्तकोटि स्वरूपा आदिव्याधि त्रोटिनी।


क्रों क्रों क्रों कुरूकुल्ले दुष्ट प्रयोगान नाशिनी।।


ह्रीं ह्रीं ह्रीं अंबिके भोग मोक्ष प्रदायिनी।

क्लीं क्लीं क्लीं कामुके कामसिद्धि दायिनी।।


उपरोक्त मंत्रों के साथ पूजन करने के बाद मूंगा की माला लेकर 11 दिनों तक 23 माला जाप करें और एक 23 दिनों तक 63 माला जाप करें


इस मंत्र को पढ़ते हुए जाप करें


॥ ह सें ह स क रीं ह सें ॥


॥ ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥


भैरवी मंत्र


‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:’


उपरोक्त मंत्रों के बाद इस मंदिर का भी जाप कर सकते हैं

।। ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।।

।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।।

।। ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।।


भैरवी साधना से सिद्ध होने के बाद क्या होता है ?


 सिद्ध हो जाने के बाद साधक त्रिकालदर्शी की तरह ब्रह्मांड का ज्ञाता हो जाता है और ब्रह्मांड में भूलने वाले सभी प्रकार के मंत्र उसे सुनाई देने लगते हैं दिव्य प्रकाश दिखाई देता है और आजीवन कामवासना से मुक्त हो जाता है मन स्थिर होकर शांत हो जाता है तथा चेहरे पर एक अलौकिक तेज दिखाई देता है .


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी-साधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैं, दिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक काम-वासना जागृत नहीं होती । साथ ही उसका मन शान्त व स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है।


 चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।



https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE

https://youtu.be/_n0ECnDnLls

https://youtu.be/oEgcOGBbUz8

https://youtu.be/_n0ECnDnLls

https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y

https://youtu.be/-_w_g7_08jU


#BureGunoSeDoor #NaitikJeevan #https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y

https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE

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ईश्वर की कृपा ओर उस पर अतुट श्रद्धा संत मलूक दास जी

 


महान संत मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा— "अगर ईश्वर कण-कण में है, तो क्या वो मुझे इस निर्जन जंगल में भी ढूंढ लेगा? क्या वो मुझे बिना मांगे खिलाएगा?"


वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ 

पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी— "न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है!"


शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने कुदरत के पहिये घुमा दिए! राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले।


अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार लुटेरे आ धमके


मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी।

तभी झाड़ियों के पीछे से खूंखार डाकुओं का एक गिरोह निकला। उनकी तलवारें चमक रही थीं। जब उन्होंने निर्जन जंगल में सोने-चाँदी के बर्तनों में सजा राजसी खाना देखा, तो वे ठिठक गए।

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डाकुओं के सरदार ने गरजकर कहा, "रुको! यह कोई चाल लगती है। इस वीरान जंगल में इतना कीमती खाना और कोई इंसान नहीं? पक्का इसमें जहर मिलाया गया है ताकि हमें मारकर हमारा माल लूटा जा सके।"

तभी एक डाकू की नजर ऊपर बरगद के घने पत्तों पर पड़ी। उसने चिल्लाकर कहा, "सरदार! ऊपर देखो, कोई छिपा है! जरूर इसी ने यह जाल बिछाया है।"


डाकुओं ने मलूक दास जी को नीचे उतारा। वे भूख से निढाल थे, चेहरा पीला पड़ चुका था, लेकिन आँखों में वही 'हठ' और ईश्वर को आजमाने की चमक थी।

सरदार ने मलूक दास की गर्दन पर नंगी तलवार रख दी और दहाड़कर बोला:

 "ए ढोंगी! सच बता, इस खाने में जहर है न? तू चाहता है कि हम इसे खाएं और मर जाएं? अब देख, तू ही इस खाने को पहले खाएगा। अगर तूने मना किया, तो इसी पल तेरा सिर धड़ से अलग कर दूँगा!"

मलूक दास जी मन ही मन मुस्कुराए। उनकी शर्त थी— "न हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा।"

उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया और गर्दन झुका ली। यह देख डाकू और भड़क गए। उन्हें लगा कि मलूक दास मरने से डर रहा है क्योंकि खाने में वाकई जहर है। सरदार ने अपने दो गुर्गों को हुक्म दिया, "इसका मुँह जबरदस्ती खोलो और इसके गले के नीचे यह खाना उतारो!"

अगले ही पल, दो बलवान डाकुओं ने मलूक दास जी के हाथ पकड़े, एक ने उनका जबड़ा जबरदस्ती खोला और तीसरा शख्स बड़े-बड़े ग्रास उनके मुँह में ठूंसने लगा। मलूक दास जी हिल भी नहीं रहे थे, और डाकू उन्हें 'सजा' देने के लिए जबरन खिला रहे थे।


जब मलूक दास जी का पेट भर गया, तब उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा और दिल ही दिल में कहा:

"वाह रे मेरे मालिक! क्या गजब का इंतजाम है। मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था, तो तूने डाकुओं को मेरा हाथ पकड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने मौत का डर दिखाकर मेरा मुँह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है, और खिलाने के लिए 'नौकर' भी भेजता है!"


मलूक दास जी की यह हालत देखकर डाकू सहम गए। उन्हें समझ आ गया कि यह कोई अपराधी नहीं, बल्कि कोई सिद्ध महात्मा है। वे उनके चरणों में गिर पड़े।


मलूक दास जी इसी घटना के बाद नीचे उतरे और उन्होंने वह प्रसिद्ध दोहा रचा जो आज भी अमर है:

"अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।

दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥"

इसका अर्थ यह नहीं कि हम कर्म न करें, बल्कि यह है कि जब इंसान अपना अहंकार त्याग कर पूरी तरह उस परमात्मा पर निर्भर हो जाता है, तो पूरी सृष्टि उसे सँभालने में लग जाती है। हम अपनी मेहनत के भरोसे जरूर हैं, लेकिन वह मेहनत करने की शक्ति भी उसी 'ऊर्जा' से आती है।