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12 Mar 2026

64 योगिनी पूजा विधि

 🌹शिवजी से प्रगट हुये। 64 तंत्र ओर हरेक तंत्र की अधिष्ठात्री देवी है 64 योगिनी।🌹


महादानव घोर को पराजित करने महाकाली की शक्तियां बनकर घोर को पराजित किया वो योगिनी शक्तियां है । ब्रह्मांड का केंद्र शिव है इस केंद्र के वर्तुल् में हर दिशामे व्याप्त है 64 योगिनी शक्ति । इसलिए ही योगिनी मंदिर वर्तुलाकार होते है । केंद्रमें शिवलिंग स्थापित होता है । शिवाराधना स्वरूप योगिनियो का मुख शिवलिंग तरफ अंदर की ओर होता है और शिवतंत्र शक्तिसे ब्रह्मांडमें व्याप्त स्वरूप योगिनियो का मुख बाहर की तरफ होता है । 64 योगिनियो को तंत्र मार्ग ओर वैदिक उपासना मार्गमें अलग अलग नाम से पूजा जाता है । एक संपूर्ण पुरुष 32 कलाओ से युक्त होता है वही एक संपूर्ण स्त्री भी 32 कलाओ से युक्त होती है , दोनों के मिलन से बनते है 32 + 32 = 64, ऐसे है 64 योगिनी शिव और शक्ति जो सम्पूर्ण कलाओ से युक्त हैं , उनके मिलन से प्रगट हुई हैं । चौसठ योगिनियों की पूजा करने से सभी देवियों की पूजा हो जाती है। इन चौंसठ देवियों में से दस महाविद्याएं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है। ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतार रूप हैं। कुछ लोग कहते हैं कि समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं।


हर दिशा में 8 योगिनी फ़ैली हुई है, हर योगिनी के लिए एक सहायक योगिनी है, हिसाब से हर दिशा में 16 योगिनी हुई तो 4 दिशाओ में 16 × 4 = 64 योगिनी हुई । ६४ योगिनी ६४ तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। एक देवी की भी कृपा हो जाये तो उससे संबंधित तन्त्र की सिद्धी मानी जाती है।वैदिक परम्परामे 64 योगिनि :- १.बहुरूप, २.तारा, ३.नर्मदा, ४.यमुना, ५.शांति, ६.वारुणी, ७.क्षेमंकरी, ८.ऐन्द्री, ९.वाराही १०.रणवीरा, ११.वानर-मुखी, १२.वैष्णवी, १३.कालरात्रि, १४.वैद्यरूपा, १५.चर्चिका, १६.बेतली १७.छिन्नमस्तिका, १८.वृषवाहन, १९.ज्वाला कामिनी, २०.घटवार, २१.कराकाली, २२.सरस्वती, २३. बिरूपा, २४.कौवेरी, २५.भलुका, २६.नारसिंही, २७.बिरजा, २८.विकतांना, २९.महालक्ष्मी, ३०.कौमारी, ३१.महामाया, ३२.रति, ३३.करकरी, ३४.सर्पश्या, ३५.यक्षिणी, ३६.विनायकी, ३७.विंद्यावालिनी, ३८.वीर कुमारी, ३९.माहेश्वरी, ४०.अम्बिका, ४१.कामिनी, ४२. घटाबरी, ४३. स्तुती, ४४. काली, ४५. उमा, ४६.नारायणी, ४७.समुद्र, ४८.ब्रह्मिनी, ४९.ज्वालामुखी, ५०.आग्नेयी, ५१.अदिति, ५२.चन्द्रकान्ति, ५३. वायुवेगा, ५४.चामुण्डा, ५५.मूरति, ५६.गंगा, ५७.धूमावती, ५८.गांधार, ५९.सर्व मंगला, ६०.अजिता, ६१.सूर्य पुत्री, ६२.वायु वीणा, ६३.अघोर और ६४.भद्रकाली हैं। शीघ्र फलदायी योगिनी उपसनामे 8 प्रमुख योगिनी की विविध फल प्राप्ति हेतु अलग अलग विधान उपासना है पर यहां सभी 64 योगिनियो का एक ही उपासना विधान प्रस्तुत करते है ।


64 योगिनियों की साधना सोमवार अथवा अमावस्या/ पूर्णिमा की रात्रि से आरंभ की जाती है। साधना आरंभ करने से पहले स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर अपने पितृगण, इष्टदेव तथा गुरु का आशीर्वाद लें। तत्पश्चात् गणेश मंत्र तथा गुरुमंत्र का जप किया जाता है ताकि साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न न आएं। इसके बाद भगवान शिव का पूजा करते हुए शिवलिंग पर जल तथा अष्टगंध युक्त अक्षत (चावल) अर्पित करें। इसके बाद आपकी पूजा आरंभ होती है। एक चौरंग पर लाल वस्त्र पर अक्षत रखकर उन पर योगिनियंत्र या फिर 64 सुपारी स्थापित करे । पंचोपचार पूजन करे । फिर 64 योगिनियो के मंत्र जप करे । हरेक मंत्र की एक माला जप करे । अंत में जिस भी योगिनि को सिद्ध करना चाहते हैं, उसके मंत्र की कम से कम 11 ग्यारह माला (1100 मंत्र) जप करें।


64 योगिनियों के मंत्र ; –


(1) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा।


(2) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा।


(3) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा।


(4) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा।


(5) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा।


(6) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा।


(7) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा।


(8) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा।


(9) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा।


(10) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा।


(11) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा।


(12) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा।


(13) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा।


(14) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा।


(15) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा।


(16) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा।


(17) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा।


(18) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा।


(19) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा।


(20) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा।


(21) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा।


(22) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा।


(23) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा।


(24) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा।


(25) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा।


(26) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा।


(27) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा।


(28) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा।


(29) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा।


(30) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा।


(31) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा।


(32) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा।


(33) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा।


(34) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा।


(35) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा।


(36) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा।


(37) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा।


(38) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा।


(39) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा।


(40) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा।


(41) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा।


(42) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा।


(43) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा।


(44) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा।


(45) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा।


(46) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा।


(47) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा।


(48) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा।


(49) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा।


(50) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा।


(51) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा।


(52) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा।


(53) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा।


(54) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा।


(55) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा।


(56) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा।


(57) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा।


(58) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा।


(59) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा।


(60) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा।


(61) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा।


(62) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा।


(63) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा।


(64) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा।


मंत्र जाप के बाद योगिनी स्तोत्र पाठ करे ।


चतुष्षष्टि-योगिनी नाम-स्तोत्रम्


गजास्या सिंह-वक्त्रा च, गृध्रास्या काक-तुण्डिका ।


उष्ट्रा-स्याऽश्व-खर-ग्रीवा, वाराहास्या शिवानना ।।


उलूकाक्षी घोर-रवा, मायूरी शरभानना ।


कोटराक्षी चाष्ट-वक्त्रा, कुब्जा च विकटानना ।।


शुष्कोदरी ललज्जिह्वा, श्व-दंष्ट्रा वानरानना ।


ऋक्षाक्षी केकराक्षी च, बृहत्-तुण्डा सुराप्रिया ।।


कपालहस्ता रक्ताक्षी च, शुकी श्येनी कपोतिका ।


पाशहस्ता दंडहस्ता, प्रचण्डा चण्डविक्रमा ।।


शिशुघ्नी पाशहन्त्री च, काली रुधिर-पायिनी ।


वसापाना गर्भरक्षा, शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ।।


ऋक्ष-केशी महा-कुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका ।


दन्द-शूक-धरा क्रौञ्ची, मृग-श्रृंगा वृषानना ।।


फाटितास्या धूम्रश्वासा, व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका ।


तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ।।


विद्युल्लोला वलाकास्या, मार्जारी कटपूतना ।


अट्टहास्या च कामाक्षी, मृगाक्षी चेति ता मताः ।।


स्तोत्र पाठ के बाद वेदी में ( छोटा यज्ञ कुंडी ) में अग्नि स्थापन करे और सभी 64 योगिनी के नाम के स्मरण करते हुवे 11 आहुति दीजिए ।( शुद्ध घी से या फिर हवन द्रव्य से आहुति दे )


प्रत्येक नाम के आदि में ‘ॐ’ तथा अन्त में स्वाहा लगाकर हवन करें –


१॰ ॐ गजास्यै स्वाहा, २॰ सिंह-वक्त्रायै, ३॰ गृध्रास्यायै, ४॰ काक-तुण्डिकायै , ५॰ उष्ट्रास्यायै, ६॰ अश्व-खर-ग्रीवायै, ७॰ वाराहस्यायै, ८॰ शिवाननायै, ९॰ उलूकाक्ष्यै, १०॰ घोर-रवायै, ११॰ मायूर्यै, १२॰ शरभाननायै, १३॰ कोटराक्ष्यै, १४॰ अष्ट-वक्त्रायै, १५॰ कुब्जायै, १६॰ विकटाननायै, १७॰ शुष्कोदर्यै, १८॰ ललज्जिह्वायै, १९॰ श्व-दंष्ट्रायै, २०॰ वानराननायै, २१॰ ऋक्षाक्ष्यै, २२॰ केकराक्ष्यै, २३॰ बृहत्-तुण्डायै, २४॰ सुरा-प्रियायै, २५॰ कपाल-हस्तायै, २६॰ रक्ताक्ष्यै, २७॰ शुक्यै, २८॰ श्येन्यै, २९॰ कपोतिकायै, ३०॰ पाश-हस्तायै, ३१॰ दण्ड-हस्तायै, ३२॰ प्रचण्डायै, ३३॰ चण्ड-विक्रमायै, ३४॰ शिशुघ्न्यै, ३५॰ पाश-हन्त्र्यै, ३६॰ काल्यै, ३७॰ रुधिर-पायिन्यै, ३८॰ वसा-पानायै, ३९॰ गर्भ-भक्षायै, ४०॰ शव-हस्तायै, ४१॰ आन्त्र-मालिकायै, ४२॰ ऋक्ष-केश्यै, ४३॰ महा-कुक्ष्यै, ४४॰ नागास्यायै, ४५॰ प्रेत-पृष्ठकायै, ४६॰ दन्द-शूक-धरायै, ४७॰ क्रौञ्च्यै, ४८॰ मृग-श्रृंगायै, ४९॰ वृषाननायै, ५०॰ फाटितास्यायै, ५१॰ धूम्र-श्वासायै, ५२॰ व्योम-पादायै, ५३॰ ऊर्ध्व-दृष्टिकायै, ५४॰ तापिन्यै, ५५॰ शोषिण्यै, ५६॰ स्थूल-घोणोष्ठायै, ५७॰ कोटर्यै, ५८॰ विद्युल्लोलायै, ५९॰ बलाकास्यायै, ६०॰ मार्जार्यै, ६१॰ कट-पूतनायै, ६२॰ अट्टहास्यायै, ६३॰ कामाक्ष्यै, ६४॰ मृगाक्ष्यै ।


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इस के बाद योगिनी यंत्र स्थापन ओर भगवान शिव की आरती करें । पूजा के बाद क्षमापना प्रार्थना करे ।


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव l


आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं ।


साधना समाप्त होने के बाद शिवलिंग पर चढ़ाएं चावल अलग से रख लें तथा अगले दिन बहते जल यथा नदी में प्रवाहित कर दें। ये उपासना 21 रात्रि तक करनी है । योगिनी देवी की माता स्वरूप ही उपासना करें । उपासना पूर्ण होने के बाद यंत्र या मूर्ति या सुपारी में स्थापना की हो वो सिद्ध हो जाएगा । चौरंग पर स्थापित उसी लाल वस्त्रम बांधकर अल्मारीमे रख दीजिए । ये उपासना के बाद जीवनमे कोई कमी नही रहेगी । बचपन से लेकर आजतक जो भी सपने देखे हो सच हो जाएँगे । हरेक समस्या स्वयम ही नाश हो जाएगी । कभी बीच उपसनामे ही कोई योगिनी प्रगट हो जाय तो वंदन किजीये पर कुछ मांगना नही । वो कहे तो भी विनंती कीजिये कि 21 दिन पूरे होने पर आप प्रसन्न रहिए । 21 वे दिन जब साधना पूर्ण हो तब दंडवत प्रणाम कीजिये और फिर जीवनमे जो भी पाना चाहते हो वो योगिनी माताओं से निवेदन कीजिये । सतयुग से आजतक महान सिद्धयोगीओ ने इस योगिनी शक्तिओ से ही अनेक सिद्धि प्राप्त की है

8 Mar 2026

रक्षा कवच घर के लिये

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घर की रक्षा करने वाले तांत्रिक देवता और तांत्रिक रक्षा कवच की प्राचीन विधि

तंत्र और आगम परंपरा में माना गया है कि प्रत्येक स्थान केवल भौतिक रूप से ही नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जा से भी प्रभावित होता है। इसी कारण प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना तथा तांत्रिक रक्षा कवच बनाया जाता था।

तंत्र ग्रंथों में बताया गया है कि यदि किसी स्थान पर वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा बनी रहे तो वह स्थान एक अदृश्य दिव्य सुरक्षा मंडल से घिर जाता है और नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ प्रवेश नहीं कर पातीं।

घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता


क्षेत्रपाल – किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता माने जाते हैं।


काल भैरव – सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के अत्यंत शक्तिशाली रक्षक देवता।


नृसिंह – उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देवता।


हनुमान – भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाले देव।


गरुड़ – विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से रक्षा करने वाले देवता।


चामुंडा – तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी मानी जाती हैं।


प्रत्यंगिरा – अभिचार और काली शक्तियों का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।


नवदुर्गा – देवी के नौ रूप जो साधक और घर की रक्षा करते हैं।


कुबेर – उत्तर दिशा के रक्षक और समृद्धि के अधिपति।

नाग देवता – भूमि और पाताल से जुड़े अदृश्य रक्षक देवता।


तांत्रिक मान्यता के अनुसार इन देवताओं की कृपा से घर के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा ऊर्जा स्थापित हो जाती है।

घर के चारों ओर तांत्रिक रक्षा कवच बनाने की प्राचीन विधि

सबसे पहले घर या साधना स्थल को साफ और पवित्र करें। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान की रक्षा की प्रार्थना करें।


अब घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम का छिड़काव करें। इसके बाद मुख्य द्वार पर खड़े होकर यह मंत्र 21 बार जप करें —


ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।


अब मन में कल्पना करें कि आपके घर के चारों ओर एक तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है जो पूरे स्थान को चारों ओर से घेर रहा है। यही ऊर्जा मंडल तांत्रिक रक्षा कवच माना जाता है।


यह प्रयोग कब किया जाता है

यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को किया जाता है। साधक लोग नई साधना प्रारंभ करने से पहले भी यह विधि करते हैं।


तांत्रिक परंपरा का रहस्य

तंत्र ग्रंथों में कहा गया है कि जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ स्वतः ही एक दिव्य रक्षक मंडल बन जाता है। ऐसे स्थान पर नकारात्मक शक्तियों, प्रेत बाधा और तांत्रिक अभिचार का प्रभाव बहुत कम हो जाता है।


नमामीशमीशान 

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🛡️ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता और प्राचीन 'रक्षा कवच' विधि! 🔱
(नकारात्मक शक्तियों और बुरी नज़र से अपने घर को कैसे सुरक्षित रखें, अंत तक पढ़ें)
तंत्र और आगम परंपरा के अनुसार, हमारा घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह सूक्ष्म ऊर्जाओं से भी प्रभावित होता है। प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना की जाती थी और एक अभेद्य 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाया जाता था।
ग्रंथों में स्पष्ट है कि जहाँ वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा होती है, वह स्थान एक अदृश्य सुरक्षा चक्र से घिर जाता है और वहाँ कोई भी नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती। 🚫👻
✨ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता: ✨
१. क्षेत्रपाल: किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता।
२. काल भैरव: सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के सबसे शक्तिशाली रक्षक!
३. भगवान नृसिंह: उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देव।
४. हनुमान जी: भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाले।
५. गरुड़ देव: विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से बचाने वाले।
६. माँ चामुंडा: तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी।
७. माँ प्रत्यंगिरा: काले जादू (अभिचार) और शत्रु बाधा का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।
८. नवदुर्गा: देवी के नौ रूप, जो हर दिशा से साधक के परिवार की रक्षा करते हैं।
९. कुबेर देव: उत्तर दिशा के रक्षक और सुख-समृद्धि के स्वामी।
१०. नाग देवता: भूमि और पाताल से जुड़े घर के अदृश्य रक्षक।
🔥 घर के चारों ओर 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाने की प्राचीन विधि: 🔥
आप स्वयं अपने घर को सुरक्षित करने के लिए यह सरल लेकिन अचूक प्रयोग कर सकते हैं:
🔹 पहला चरण: घर को अच्छी तरह साफ और पवित्र करें।
🔹 दूसरा चरण: पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान देवता से घर की रक्षा की प्रार्थना करें।
🔹 तीसरा चरण: घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम (रोली) का छिड़काव करें।
🔹 चौथा चरण: अपने घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर इस मंत्र का 21 बार जाप करें:
👉 "ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।"
🔹 पाँचवा चरण: अब आँखें बंद करके यह कल्पना (Visualization) करें कि आपके घर के चारों ओर एक अत्यंत तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है, जो पूरे घर को कवर कर रहा है। यही आपका 'तांत्रिक रक्षा कवच' है। 🛡️✨
🗓️ यह प्रयोग कब करें?
यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को बनाना सबसे फलदायी होता है। कोई भी नई साधना शुरू करने से पहले भी साधक यही विधि अपनाते हैं।
🔱 तंत्र का परम रहस्य: 🔱
जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ तांत्रिक अभिचार (काले जादू), प्रेत बाधा और बुरी नज़र का प्रभाव शून्य हो जाता है।
🚩 जय काल भैरव! 🚩
🚩 हर हर महादेव! 🚩

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4 Mar 2026

सिद्धियाँ क्या होती हैं?

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🙏 सिद्धियाँ क्या होती हैं? विस्तृत व्याख्या - ध्यान, होश और साक्षी भाव के संदर्भ में 🙏


दोस्तों, आज हम बात करेंगे एक बहुत ही गहरे और रहस्यमय विषय पर - सिद्धियाँ। यह शब्द सुनते ही हमारे मन में चमत्कार, जादू, अलौकिक शक्तियों के चित्र उभरने लगते हैं। लेकिन सिद्धियाँ वास्तव में क्या हैं? क्या ये कोई चमत्कार हैं या फिर इनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है? आइए इसे ध्यान, होश और साक्षी भाव के नजरिए से समझते हैं।


🌑 सिद्धि का असली अर्थ


सिद्धि शब्द संस्कृत की 'सिध्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है - सिद्ध होना, प्राप्त करना, पूरा होना। सिद्धि का मतलब कोई जादू या चमत्कार नहीं है। यह मन की वह अवस्था है जब आपका ध्यान इतना गहरा हो जाता है, आपका होश इतना तीव्र हो जाता है कि आप उन चीजों को देखने, समझने और करने लगते हैं जो आम लोगों की पहुंच से बाहर होती हैं।


सिद्धियाँ कोई बाहरी चीज नहीं हैं जो किसी को दे दी जाती हैं। यह हमारे भीतर ही छिपी होती हैं, बस जागृत होने का इंतजार कर रही होती हैं। जब हमारा ध्यान एकाग्र होता है, हमारा होश गहरा होता है, तब ये शक्तियां अपने आप प्रकट होने लगती हैं।


🧠 चेतन मन, अवचेतन मन और सिद्धियाँ


हमारे मन के तीन स्तर होते हैं - चेतन मन, अवचेतन मन और अचेतन मन।


चेतन मन - यह वह हिस्सा है जिससे हम सोचते हैं, निर्णय लेते हैं, समझते हैं। यह दिमाग का सबसे ऊपरी हिस्सा है।


अवचेतन मन - यह वह हिस्सा है जो बिना हमारी जानकारी के सब कुछ रिकॉर्ड करता रहता है। हमारी आदतें, हमारे संस्कार, हमारी यादें - ये सब यहीं रहती हैं।


अचेतन मन - यह सबसे गहरा हिस्सा है। यहीं पर सिद्धियों का बीज छिपा होता है।


जब हम ध्यान करते हैं, तो हम चेतन मन को शांत करते हैं और अवचेतन में प्रवेश करते हैं। जब ध्यान और गहरा होता है, तो हम अचेतन में पहुंचते हैं। यहीं से सिद्धियाँ प्रकट होती हैं।


🔮 सिद्धियाँ कैसे काम करती हैं?


सिद्धियाँ काम करने का तरीका समझने के लिए हमें थोड़ा विज्ञान समझना होगा। हमारा हर विचार एक ऊर्जा है। हर शब्द एक कंपन है। जब हम किसी चीज के बारे में गहराई से सोचते हैं, तो हम उस चीज के कंपन से जुड़ जाते हैं।


मान लीजिए कोई व्यक्ति दूर बैठा है और आप उसके बारे में सोच रहे हैं। आमतौर पर आपका विचार बिखर जाता है। लेकिन अगर आपका ध्यान एकाग्र है, आपका होश गहरा है, तो आपका विचार एक सुई की तरह नुकीला हो जाता है और सीधा उस व्यक्ति तक पहुंच सकता है। यही टेलीपैथी का रहस्य है।


ठीक इसी तरह, जब हमारा ध्यान एकाग्र होता है, तो हम अपने शरीर के भीतर की ऊर्जा को महसूस कर सकते हैं। हम उसे नियंत्रित कर सकते हैं। यही प्राणायाम और कुंडलिनी जागरण का आधार है।


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⚡ चक्र और सिद्धियाँ - एक गहरा संबंध


हमारे शरीर में सात मुख्य चक्र होते हैं। हर चक्र का अपना स्थान है, अपना काम है, अपनी ऊर्जा है। और हर चक्र के जागृत होने पर कुछ न कुछ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


🌱 मूलाधार चक्र (रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे)


यह चक्र हमारे अस्तित्व, सुरक्षा और जीवित रहने की भावना से जुड़ा है। इसके जागृत होने पर व्यक्ति में निर्भयता आती है। वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।


💧 स्वाधिष्ठान चक्र (पेट के निचले हिस्से में)


यह चक्र रचनात्मकता, इच्छाओं और भावनाओं से जुड़ा है। इसके जागृत होने पर व्यक्ति में अद्भुत रचनात्मकता आती है। वह कला, संगीत, साहित्य में निपुण हो जाता है।


🔥 मणिपूर चक्र (नाभि के पास)


यह चक्र शक्ति, आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति का केंद्र है। इसके जागृत होने पर व्यक्ति में अपार सहनशक्ति आती है। वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी डटा रहता है।


💚 अनाहत चक्र (हृदय के पास)


यह चक्र प्रेम, करुणा और भक्ति का केंद्र है। इसके जागृत होने पर व्यक्ति में असीम प्रेम और करुणा का भाव आता है। वह सबसे प्रेम करने लगता है।


💙 विशुद्धि चक्र (गले के पास)


यह चक्र संचार, अभिव्यक्ति और सत्य का केंद्र है। इसके जागृत होने पर व्यक्ति की वाणी में अद्भुत शक्ति आती है। वह जो बोलता है, वह सच होने लगता है। उसकी बातों में असर होता है। लोग उसकी बात मानने लगते हैं।


🔑 विशुद्धि के नीचे के चक्र - सिद्धियों का क्षेत्र


यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझने वाली है। सिद्धियाँ जितनी भी हैं, वे विशुद्धि चक्र के नीचे के चक्रों से प्राप्त होती हैं - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत और विशुद्धि। इन चक्रों के जागृत होने पर जो शक्तियाँ मिलती हैं, उन्हें सिद्धियाँ कहा जाता है।


यानी जब तक हम विशुद्धि चक्र तक हैं, तब तक हम सिद्धियों के क्षेत्र में हैं। यहाँ पर 'मैं' का भाव रहता है। सिद्धियाँ 'मैं' के कारण ही आती हैं। 'मैं' शक्तिशाली हूँ, 'मैं' कुछ कर सकता हूँ - यह भाव इन सिद्धियों के साथ जुड़ा रहता है।


🌟 विशुद्धि चक्र पर साक्षी भाव


अब आते हैं विशुद्धि चक्र पर। यहाँ एक बहुत ही खास बात है। विशुद्धि चक्र पर व्यक्ति साक्षी भाव में रहता है। इसका मतलब यह नहीं कि उसे सिद्धियाँ नहीं मिलतीं, बल्कि उसे मिलती हैं, लेकिन वह उनसे चिपकता नहीं। वह उनका उपयोग करता है, लेकिन उनमें उलझता नहीं।


विशुद्धि चक्र पर व्यक्ति की वाणी में शक्ति आ जाती है, लेकिन वह उस शक्ति का दुरुपयोग नहीं करता। वह जो बोलता है, वह सच होता है, लेकिन वह बोलने से पहले सोचता है। वह साक्षी भाव में रहता है - देखता है कि क्या बोल रहा हूँ, क्यों बोल रहा हूँ, कैसे बोल रहा हूँ।


👁️ विशुद्धि के ऊपर के चक्र - आगे का सफर


अब आते हैं विशुद्धि के ऊपर के चक्रों पर - आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र। यहाँ का नियम बिल्कुल अलग है। विशुद्धि के ऊपर के चक्रों में सिद्धियाँ नहीं, बल्कि और गहरा साक्षी भाव जागृत होता है।


जब कोई व्यक्ति आज्ञा चक्र या सहस्रार चक्र तक पहुंच जाता है, तो उसे सिद्धियों की कोई इच्छा नहीं रहती। वह तो बस देखता रहता है। वह सब कुछ होने देता है, लेकिन उसमें उलझता नहीं। वह साक्षी बना रहता है।


यहाँ पर 'मैं' का भाव खत्म हो जाता है। 'मैं' कुछ कर रहा हूँ, यह भाव नहीं रहता। बस हो रहा है, और वह देख रहा है। यही साक्षी भाव है।


इस स्तर पर पहुंचा व्यक्ति सिद्धियों का उपयोग नहीं करता, क्योंकि उसे कुछ पाना नहीं होता। वह तो पूर्ण है ही। उसे किसी चीज की कमी नहीं है। वह बस सब कुछ होने देता है।


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🧘 ध्यान, होश और साक्षी भाव से सिद्धियों को समझना


अब बात करते हैं ध्यान, होश और साक्षी भाव की। ये तीनों सिद्धियों को समझने के लिए बहुत जरूरी हैं।


ध्यान - ध्यान का मतलब है किसी एक बिंदु पर टिक जाना। जब हम ध्यान करते हैं, तो हमारा मन बिखरता नहीं, बल्कि एक जगह इकट्ठा हो जाता है। यह इकट्ठा हुआ मन बहुत शक्तिशाली हो जाता है। इससे सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


होश - होश का मतलब है जागरूकता। जब हम कोई भी काम करते हैं, तो पूरे होश से करते हैं। हमें पता होता है कि हम क्या कर रहे हैं। हमारा मन भटकता नहीं। यह होश ही है जो हमें सिद्धियों के दुरुपयोग से बचाता है।


साक्षी भाव - साक्षी भाव का मतलब है बस देखते रहना। जैसे कोई सिनेमा देख रहा हो। उसमें उलझता नहीं, बस देखता रहता है। यह साक्षी भाव ही है जो हमें विशुद्धि पर संतुलित रखता है और फिर आगे आज्ञा और सहस्रार तक ले जाता है।


⚠️ सिद्धियों से जुड़ी सावधानियाँ


सिद्धियाँ अपने आप में न तो अच्छी हैं और न ही बुरी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका उपयोग कैसे किया जाता है। अगर किसी के मन में अहंकार है, लोभ है, तो सिद्धियाँ उसके लिए खतरनाक हो सकती हैं। वह उनका दुरुपयोग कर सकता है और अपना ही नुकसान कर सकता है।


इसलिए सिद्धियों से ज्यादा जरूरी है साक्षी भाव। अगर साक्षी भाव है, तो सिद्धियाँ आएंगी भी तो व्यक्ति उनमें उलझेगा नहीं। वह उनका सही उपयोग करेगा और आगे बढ़ता रहेगा।


🌿 अंतिम बात


दोस्तों, सिद्धियाँ कोई चमत्कार नहीं हैं। यह हमारे अपने मन की, हमारे अपने शरीर की, हमारे अपने चक्रों की शक्तियाँ हैं। जब हम ध्यान करते हैं, जब हम होश में रहते हैं, जब हम साक्षी भाव विकसित करते हैं, तो ये शक्तियाँ अपने आप जागृत होने लगती हैं।


लेकिन याद रखें, सिद्धियाँ मंजिल नहीं हैं, यह रास्ते हैं। असली मंजिल है साक्षी भाव, आत्मसाक्षात्कार, परम चेतना से मिलन। सिद्धियाँ आएं तो अच्छा है, न आएं तो भी कोई बात नहीं। बस ध्यान करते रहो, होश में रहो, साक्षी भाव को गहरा करते रहो। बाकी सब अपने आप होता जाएगा।


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