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13 Mar 2026

મહાકાલી માતાજી સ્ત્રોત કિલકમ

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क्या आपने कभी “काली कीलकम्” का नाम सुना है?

तंत्र शास्त्र कहता है 

बिना कीलक के मंत्र और साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला।

यही वह गुप्त तांत्रिक सूत्र है जिससे

साधक की रक्षा होती है,

दरिद्रता मिटती है,

और माँ काली की कृपा से जीवन के द्वार खुलते हैं।

आज पहली बार Mahakali Tantra में

इस अद्भुत रहस्य की झलक।

🔱 पढ़ें और अनुभव करें।


क्या आप जानते हैं कि आपकी कठिन साधना, मंत्र जप और कवच पाठ निष्फल क्यों हो जाते हैं? तंत्र का एक अटल सत्य है बिना 'कीलक' के साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला!


स्वयं भगवान शिव ने स्वीकारा है कि देवी काली ही 'परतत्त्व' हैं। लेकिन उनके तेज को प्राप्त करने के लिए जिस चाबी की आवश्यकता है, वह है काली कीलकम्। यह मात्र एक स्तोत्र नहीं, बल्कि वह दिव्य ऊर्जा है जिसने दुर्वासा, वशिष्ठ और देवगुरु बृहस्पति जैसे ऋषियों को ऐश्वर्य के शिखर पर पहुँचाया।


॥ श्री काली कीलकम् ॥

विनियोग:

ॐ अस्य श्री कालिका कीलकस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टप् छन्दः, श्री दक्षिण कालिका देवता, सर्वार्थ सिद्धि साधने कीलक न्यासे जपे विनियोगः ।


कीलक महिमा:

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीलकं सर्वकामदम् ।

कालिकायाः परं तत्त्वं सत्यं सत्यं त्रिभिर्ममः ॥

दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।

सुरेशो धनदश्चैव अङ्गराश्च भृभूद्वाहः ॥

च्यवनः कार्तवीर्यश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।

कीलकस्य प्रसादेन सर्वैश्वर्चमवाप्नुयुः ॥

अथ काली कीलकम्:

ॐ कारं तु शिखाप्रान्ते लम्बिका स्थान उत्तमे ।

सहस्त्रारे पङ्कजे तु क्रीं क्रीं वाग्विलासिनी ॥

कूर्चबीजयुगं भाले नाभौ लज्जायुगं प्रिये ।

दक्षिणे कालिके पातु स्वनासापुट युग्मके ॥

हूंकारद्वन्द्वं गण्डे द्वे द्वे माये श्रवणद्वये ।

आद्यातृतीयं विन्यस्य उत्तराधर सम्पुटे ॥

स्वाहा दशनमध्ये तु सर्व वर्णन्न्यसेत् क्रमात् ।

मुण्डमाला असिकरा काली सर्वार्थसिद्धिदा ॥

चतुरक्षरी महाविद्या क्रीं क्रीं हृदय पङ्कजे ।

ॐ हूं ह्नीं क्रीं ततो हूं हट् स्वाहा च कंठकूपके ॥

अष्टाक्षरी कालिकाया नाभौ विन्यस्य पार्वति ।

क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहान्ते च दशाक्षरी ॥

मम बाहु युगे तिष्ठ मम कुण्डलिकुण्डले ।

हूं ह्नीं मे वह्निजाया च हूं विद्या तिष्ठ पृष्ठके ॥

क्रीं हूं ह्नीं वक्षदेशे च दक्षिणे कालिके सदा ।

क्रीं हूं ह्नीं वह्निजायाऽन्ते चतुर्दशाक्षरेश्वरी ॥

क्रीं तिष्ठ गुह्यदेशे मे एकाक्षरी च कालिका ।

ह्नीं हूं फट् च महाकाली मूलाधार निवासिनी ॥

सर्वरोमाणि मे काली करांगुल्यङ्क पालिनी ।

कुल्ला कटिं कुरुकुल्ला तिष्ठ तिष्ठ सदा मम ॥

विरोधिनी जानुयुग्मे विप्रचित्ता पदद्वये ।

तिष्ठ मे च तथा चोग्रा पादमूले न्यसेत्क्रमात् ॥

प्रभा तिष्ठतु पादाग्रे दीप्ता पादांगुलीनपि ।

नीली न्यसेद्विन्दु देशे घना नादे च तिष्ठ मे ॥

वलाका विन्दुमार्गे च न्यसेत्सर्वाङ्ग सुन्दरी ।

मम पातालके मात्रा तिष्ठ स्वकुल कायिके ॥

मुद्रा तिष्ठ स्वमत्येमां मितास्वङ्गाकुलेषु च ।

एता नृमुण्डमालास्त्रग्धारिण्य: खड्‌गपाणयः ॥

तिष्ठन्तु मम गात्राणि सन्धिकूपानि सर्वशः ।

ब्राह्मी च ब्रह्मरंध्रे तु तिष्ठ स्व घटिका परा ॥

नारायणी नेत्रयुगे मुखे माहेश्वरी तथा ।

चामुण्डा श्रवणद्वन्द्वे कौमारी चिबुके शुभे ॥

तथामुदरमध्ये तु तिष्ठ मे चापराजिता ।

वाराही चास्थिसन्धौ च नारसिंही नृसिंहके ॥

आयुधानि गृहीतानि तिष्ठस्वेतानि मे सदा ।

फलश्रुति:

इति ते कीलकं दिव्यं नित्यं यः कीलयेत्स्वकम् ॥

कवचादौ महेशानि तस्यः सिद्धिर्न संशयः ।

श्मशाने प्रेतयोर्वापि प्रेतदर्शनतत्परः ॥

यः पठेत्पाठयेद्वापि सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।

सवाग्मी धनवान्दक्षः सर्वाध्यक्ष: कुलेश्वर: ॥

पुत्र बांधव सम्पन्नः समीर सदृशो बले ।

न रोगवान् सदा धीरस्तापत्रय निषूदनः ॥

मुच्यते कालिका पायात् तृणराशिमिवानला ।

न शत्रुभ्यो भयं तस्य दुर्गमेभ्यो न बाध्यते ॥

यस्य य देशे कीलकं तु धारणं सर्वदाम्बिके ।

तस्य सर्वार्थसिद्धि: स्यात्सत्यं सत्यं वरानने ॥

मंत्रच्छतगुणं देवि कवचं यन्मयोदितम् ।

तस्माच्छतगुणं चैव कीलकं सर्वकामदम् ॥

तथा चाप्यसिता मंत्रं नील सारस्वते मनौ ।

न सिध्यति वरारोहे कीलकार्गलके विना ॥

विहीने कीलकार्गलके काली कवच यः पठेत् ।

तस्य सर्वाणि मंत्राणि स्तोत्राण्यन सिद्धये प्रिये ॥

॥ काली कीलकम् समाप्त ॥


काली कीलकम् के अद्भुत लाभ 

  सुरक्षा चक्र: इसके पाठ से शरीर के रोम-रोम की रक्षा होती है। हिंसक पशु या शत्रु आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकते।

  सफलता की कुंजी: मंत्र जाप से 100 गुना अधिक फल कवच का है, और कवच से 100 गुना अधिक प्रभाव इस कीलक का है।

  दरिद्रता का नाश: यह पाठ साधक को कुबेर के समान ऐश्वर्यवान और समाज में सम्मानित बनाता है।

  रोग मुक्ति: भयंकर रोगों और अकाल मृत्यु के भय को जड़ से मिटा देता है।


सामान्य सिद्ध विधि (जनसाधारण के लिए) 🚩

 किसी भी शुक्रवार या अमावस्या की रात्रि से पाठ आरंभ करें।

 दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काली माँ की प्रतिमा या यंत्र के समक्ष दीपक जलाएं।

 सर्वप्रथम विनियोग करें, फिर श्रद्धापूर्वक 'काली कीलकम्' का 11 बार पाठ करें।

  पाठ के बाद माँ काली से अपनी मनोकामना कहें। यह सरल विधि भी आपको चमत्कारिक अनुभव कराएगी।


⚠️ सावधान! क्या आप जानते हैं इसके 'गुप्त और लुप्त' प्रयोग?

काली कीलकम् मात्र एक पाठ नहीं है, इसके भीतर स्तम्भन, वशीकरण, उच्चाटन और मारण जैसी प्रचंड तांत्रिक क्रियाओं के सूत्र छिपे हैं।

  कैसे एक विशेष मुद्रा के साथ इसका पाठ करने से शत्रु स्वतः घुटने टेक देता है?

 कैसे इसके विशिष्ट न्यास से कुंडलिनी शक्ति को तीव्र गति से जागृत किया जा सकता है?

 कैसे श्मशान साधना में इसका प्रयोग कर प्रत्यक्ष दर्शन संभव हैं?

ये वे रहस्य हैं जो सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा में गुप्त रखे गए हैं। यदि आप तंत्र की पराकाष्ठा को छूना चाहते हैं और इन लुप्त प्रयोगों को सिद्ध करना चाहते हैं, तो आज ही इस महाअभियान का हिस्सा बनें।

"अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ें, महाकाली के शरणागत हों।"


 इन गुप्त प्रयोगों को सीखने और अपने जीवन को पूर्णतः बदलने के लिए आज ही 'Mahakali Tantra' ज्वाइन करें!


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12 Mar 2026

64 योगिनी पूजा विधि

 🌹शिवजी से प्रगट हुये। 64 तंत्र ओर हरेक तंत्र की अधिष्ठात्री देवी है 64 योगिनी।🌹


महादानव घोर को पराजित करने महाकाली की शक्तियां बनकर घोर को पराजित किया वो योगिनी शक्तियां है । ब्रह्मांड का केंद्र शिव है इस केंद्र के वर्तुल् में हर दिशामे व्याप्त है 64 योगिनी शक्ति । इसलिए ही योगिनी मंदिर वर्तुलाकार होते है । केंद्रमें शिवलिंग स्थापित होता है । शिवाराधना स्वरूप योगिनियो का मुख शिवलिंग तरफ अंदर की ओर होता है और शिवतंत्र शक्तिसे ब्रह्मांडमें व्याप्त स्वरूप योगिनियो का मुख बाहर की तरफ होता है । 64 योगिनियो को तंत्र मार्ग ओर वैदिक उपासना मार्गमें अलग अलग नाम से पूजा जाता है । एक संपूर्ण पुरुष 32 कलाओ से युक्त होता है वही एक संपूर्ण स्त्री भी 32 कलाओ से युक्त होती है , दोनों के मिलन से बनते है 32 + 32 = 64, ऐसे है 64 योगिनी शिव और शक्ति जो सम्पूर्ण कलाओ से युक्त हैं , उनके मिलन से प्रगट हुई हैं । चौसठ योगिनियों की पूजा करने से सभी देवियों की पूजा हो जाती है। इन चौंसठ देवियों में से दस महाविद्याएं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है। ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतार रूप हैं। कुछ लोग कहते हैं कि समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं।


हर दिशा में 8 योगिनी फ़ैली हुई है, हर योगिनी के लिए एक सहायक योगिनी है, हिसाब से हर दिशा में 16 योगिनी हुई तो 4 दिशाओ में 16 × 4 = 64 योगिनी हुई । ६४ योगिनी ६४ तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। एक देवी की भी कृपा हो जाये तो उससे संबंधित तन्त्र की सिद्धी मानी जाती है।वैदिक परम्परामे 64 योगिनि :- १.बहुरूप, २.तारा, ३.नर्मदा, ४.यमुना, ५.शांति, ६.वारुणी, ७.क्षेमंकरी, ८.ऐन्द्री, ९.वाराही १०.रणवीरा, ११.वानर-मुखी, १२.वैष्णवी, १३.कालरात्रि, १४.वैद्यरूपा, १५.चर्चिका, १६.बेतली १७.छिन्नमस्तिका, १८.वृषवाहन, १९.ज्वाला कामिनी, २०.घटवार, २१.कराकाली, २२.सरस्वती, २३. बिरूपा, २४.कौवेरी, २५.भलुका, २६.नारसिंही, २७.बिरजा, २८.विकतांना, २९.महालक्ष्मी, ३०.कौमारी, ३१.महामाया, ३२.रति, ३३.करकरी, ३४.सर्पश्या, ३५.यक्षिणी, ३६.विनायकी, ३७.विंद्यावालिनी, ३८.वीर कुमारी, ३९.माहेश्वरी, ४०.अम्बिका, ४१.कामिनी, ४२. घटाबरी, ४३. स्तुती, ४४. काली, ४५. उमा, ४६.नारायणी, ४७.समुद्र, ४८.ब्रह्मिनी, ४९.ज्वालामुखी, ५०.आग्नेयी, ५१.अदिति, ५२.चन्द्रकान्ति, ५३. वायुवेगा, ५४.चामुण्डा, ५५.मूरति, ५६.गंगा, ५७.धूमावती, ५८.गांधार, ५९.सर्व मंगला, ६०.अजिता, ६१.सूर्य पुत्री, ६२.वायु वीणा, ६३.अघोर और ६४.भद्रकाली हैं। शीघ्र फलदायी योगिनी उपसनामे 8 प्रमुख योगिनी की विविध फल प्राप्ति हेतु अलग अलग विधान उपासना है पर यहां सभी 64 योगिनियो का एक ही उपासना विधान प्रस्तुत करते है ।


64 योगिनियों की साधना सोमवार अथवा अमावस्या/ पूर्णिमा की रात्रि से आरंभ की जाती है। साधना आरंभ करने से पहले स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर अपने पितृगण, इष्टदेव तथा गुरु का आशीर्वाद लें। तत्पश्चात् गणेश मंत्र तथा गुरुमंत्र का जप किया जाता है ताकि साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न न आएं। इसके बाद भगवान शिव का पूजा करते हुए शिवलिंग पर जल तथा अष्टगंध युक्त अक्षत (चावल) अर्पित करें। इसके बाद आपकी पूजा आरंभ होती है। एक चौरंग पर लाल वस्त्र पर अक्षत रखकर उन पर योगिनियंत्र या फिर 64 सुपारी स्थापित करे । पंचोपचार पूजन करे । फिर 64 योगिनियो के मंत्र जप करे । हरेक मंत्र की एक माला जप करे । अंत में जिस भी योगिनि को सिद्ध करना चाहते हैं, उसके मंत्र की कम से कम 11 ग्यारह माला (1100 मंत्र) जप करें।


64 योगिनियों के मंत्र ; –


(1) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा।


(2) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा।


(3) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा।


(4) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा।


(5) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा।


(6) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा।


(7) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा।


(8) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा।


(9) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा।


(10) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा।


(11) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा।


(12) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा।


(13) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा।


(14) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा।


(15) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा।


(16) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा।


(17) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा।


(18) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा।


(19) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा।


(20) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा।


(21) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा।


(22) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा।


(23) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा।


(24) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा।


(25) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा।


(26) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा।


(27) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा।


(28) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा।


(29) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा।


(30) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा।


(31) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा।


(32) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा।


(33) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा।


(34) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा।


(35) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा।


(36) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा।


(37) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा।


(38) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा।


(39) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा।


(40) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा।


(41) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा।


(42) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा।


(43) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा।


(44) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा।


(45) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा।


(46) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा।


(47) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा।


(48) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा।


(49) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा।


(50) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा।


(51) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा।


(52) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा।


(53) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा।


(54) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा।


(55) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा।


(56) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा।


(57) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा।


(58) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा।


(59) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा।


(60) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा।


(61) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा।


(62) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा।


(63) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा।


(64) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा।


मंत्र जाप के बाद योगिनी स्तोत्र पाठ करे ।


चतुष्षष्टि-योगिनी नाम-स्तोत्रम्


गजास्या सिंह-वक्त्रा च, गृध्रास्या काक-तुण्डिका ।


उष्ट्रा-स्याऽश्व-खर-ग्रीवा, वाराहास्या शिवानना ।।


उलूकाक्षी घोर-रवा, मायूरी शरभानना ।


कोटराक्षी चाष्ट-वक्त्रा, कुब्जा च विकटानना ।।


शुष्कोदरी ललज्जिह्वा, श्व-दंष्ट्रा वानरानना ।


ऋक्षाक्षी केकराक्षी च, बृहत्-तुण्डा सुराप्रिया ।।


कपालहस्ता रक्ताक्षी च, शुकी श्येनी कपोतिका ।


पाशहस्ता दंडहस्ता, प्रचण्डा चण्डविक्रमा ।।


शिशुघ्नी पाशहन्त्री च, काली रुधिर-पायिनी ।


वसापाना गर्भरक्षा, शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ।।


ऋक्ष-केशी महा-कुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका ।


दन्द-शूक-धरा क्रौञ्ची, मृग-श्रृंगा वृषानना ।।


फाटितास्या धूम्रश्वासा, व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका ।


तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ।।


विद्युल्लोला वलाकास्या, मार्जारी कटपूतना ।


अट्टहास्या च कामाक्षी, मृगाक्षी चेति ता मताः ।।


स्तोत्र पाठ के बाद वेदी में ( छोटा यज्ञ कुंडी ) में अग्नि स्थापन करे और सभी 64 योगिनी के नाम के स्मरण करते हुवे 11 आहुति दीजिए ।( शुद्ध घी से या फिर हवन द्रव्य से आहुति दे )


प्रत्येक नाम के आदि में ‘ॐ’ तथा अन्त में स्वाहा लगाकर हवन करें –


१॰ ॐ गजास्यै स्वाहा, २॰ सिंह-वक्त्रायै, ३॰ गृध्रास्यायै, ४॰ काक-तुण्डिकायै , ५॰ उष्ट्रास्यायै, ६॰ अश्व-खर-ग्रीवायै, ७॰ वाराहस्यायै, ८॰ शिवाननायै, ९॰ उलूकाक्ष्यै, १०॰ घोर-रवायै, ११॰ मायूर्यै, १२॰ शरभाननायै, १३॰ कोटराक्ष्यै, १४॰ अष्ट-वक्त्रायै, १५॰ कुब्जायै, १६॰ विकटाननायै, १७॰ शुष्कोदर्यै, १८॰ ललज्जिह्वायै, १९॰ श्व-दंष्ट्रायै, २०॰ वानराननायै, २१॰ ऋक्षाक्ष्यै, २२॰ केकराक्ष्यै, २३॰ बृहत्-तुण्डायै, २४॰ सुरा-प्रियायै, २५॰ कपाल-हस्तायै, २६॰ रक्ताक्ष्यै, २७॰ शुक्यै, २८॰ श्येन्यै, २९॰ कपोतिकायै, ३०॰ पाश-हस्तायै, ३१॰ दण्ड-हस्तायै, ३२॰ प्रचण्डायै, ३३॰ चण्ड-विक्रमायै, ३४॰ शिशुघ्न्यै, ३५॰ पाश-हन्त्र्यै, ३६॰ काल्यै, ३७॰ रुधिर-पायिन्यै, ३८॰ वसा-पानायै, ३९॰ गर्भ-भक्षायै, ४०॰ शव-हस्तायै, ४१॰ आन्त्र-मालिकायै, ४२॰ ऋक्ष-केश्यै, ४३॰ महा-कुक्ष्यै, ४४॰ नागास्यायै, ४५॰ प्रेत-पृष्ठकायै, ४६॰ दन्द-शूक-धरायै, ४७॰ क्रौञ्च्यै, ४८॰ मृग-श्रृंगायै, ४९॰ वृषाननायै, ५०॰ फाटितास्यायै, ५१॰ धूम्र-श्वासायै, ५२॰ व्योम-पादायै, ५३॰ ऊर्ध्व-दृष्टिकायै, ५४॰ तापिन्यै, ५५॰ शोषिण्यै, ५६॰ स्थूल-घोणोष्ठायै, ५७॰ कोटर्यै, ५८॰ विद्युल्लोलायै, ५९॰ बलाकास्यायै, ६०॰ मार्जार्यै, ६१॰ कट-पूतनायै, ६२॰ अट्टहास्यायै, ६३॰ कामाक्ष्यै, ६४॰ मृगाक्ष्यै ।


:


इस के बाद योगिनी यंत्र स्थापन ओर भगवान शिव की आरती करें । पूजा के बाद क्षमापना प्रार्थना करे ।


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव l


आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं ।


साधना समाप्त होने के बाद शिवलिंग पर चढ़ाएं चावल अलग से रख लें तथा अगले दिन बहते जल यथा नदी में प्रवाहित कर दें। ये उपासना 21 रात्रि तक करनी है । योगिनी देवी की माता स्वरूप ही उपासना करें । उपासना पूर्ण होने के बाद यंत्र या मूर्ति या सुपारी में स्थापना की हो वो सिद्ध हो जाएगा । चौरंग पर स्थापित उसी लाल वस्त्रम बांधकर अल्मारीमे रख दीजिए । ये उपासना के बाद जीवनमे कोई कमी नही रहेगी । बचपन से लेकर आजतक जो भी सपने देखे हो सच हो जाएँगे । हरेक समस्या स्वयम ही नाश हो जाएगी । कभी बीच उपसनामे ही कोई योगिनी प्रगट हो जाय तो वंदन किजीये पर कुछ मांगना नही । वो कहे तो भी विनंती कीजिये कि 21 दिन पूरे होने पर आप प्रसन्न रहिए । 21 वे दिन जब साधना पूर्ण हो तब दंडवत प्रणाम कीजिये और फिर जीवनमे जो भी पाना चाहते हो वो योगिनी माताओं से निवेदन कीजिये । सतयुग से आजतक महान सिद्धयोगीओ ने इस योगिनी शक्तिओ से ही अनेक सिद्धि प्राप्त की है

8 Mar 2026

रक्षा कवच घर के लिये

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घर की रक्षा करने वाले तांत्रिक देवता और तांत्रिक रक्षा कवच की प्राचीन विधि

तंत्र और आगम परंपरा में माना गया है कि प्रत्येक स्थान केवल भौतिक रूप से ही नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जा से भी प्रभावित होता है। इसी कारण प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना तथा तांत्रिक रक्षा कवच बनाया जाता था।

तंत्र ग्रंथों में बताया गया है कि यदि किसी स्थान पर वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा बनी रहे तो वह स्थान एक अदृश्य दिव्य सुरक्षा मंडल से घिर जाता है और नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ प्रवेश नहीं कर पातीं।

घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता


क्षेत्रपाल – किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता माने जाते हैं।


काल भैरव – सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के अत्यंत शक्तिशाली रक्षक देवता।


नृसिंह – उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देवता।


हनुमान – भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाले देव।


गरुड़ – विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से रक्षा करने वाले देवता।


चामुंडा – तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी मानी जाती हैं।


प्रत्यंगिरा – अभिचार और काली शक्तियों का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।


नवदुर्गा – देवी के नौ रूप जो साधक और घर की रक्षा करते हैं।


कुबेर – उत्तर दिशा के रक्षक और समृद्धि के अधिपति।

नाग देवता – भूमि और पाताल से जुड़े अदृश्य रक्षक देवता।


तांत्रिक मान्यता के अनुसार इन देवताओं की कृपा से घर के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा ऊर्जा स्थापित हो जाती है।

घर के चारों ओर तांत्रिक रक्षा कवच बनाने की प्राचीन विधि

सबसे पहले घर या साधना स्थल को साफ और पवित्र करें। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान की रक्षा की प्रार्थना करें।


अब घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम का छिड़काव करें। इसके बाद मुख्य द्वार पर खड़े होकर यह मंत्र 21 बार जप करें —


ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।


अब मन में कल्पना करें कि आपके घर के चारों ओर एक तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है जो पूरे स्थान को चारों ओर से घेर रहा है। यही ऊर्जा मंडल तांत्रिक रक्षा कवच माना जाता है।


यह प्रयोग कब किया जाता है

यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को किया जाता है। साधक लोग नई साधना प्रारंभ करने से पहले भी यह विधि करते हैं।


तांत्रिक परंपरा का रहस्य

तंत्र ग्रंथों में कहा गया है कि जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ स्वतः ही एक दिव्य रक्षक मंडल बन जाता है। ऐसे स्थान पर नकारात्मक शक्तियों, प्रेत बाधा और तांत्रिक अभिचार का प्रभाव बहुत कम हो जाता है।


नमामीशमीशान 

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🛡️ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता और प्राचीन 'रक्षा कवच' विधि! 🔱
(नकारात्मक शक्तियों और बुरी नज़र से अपने घर को कैसे सुरक्षित रखें, अंत तक पढ़ें)
तंत्र और आगम परंपरा के अनुसार, हमारा घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह सूक्ष्म ऊर्जाओं से भी प्रभावित होता है। प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना की जाती थी और एक अभेद्य 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाया जाता था।
ग्रंथों में स्पष्ट है कि जहाँ वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा होती है, वह स्थान एक अदृश्य सुरक्षा चक्र से घिर जाता है और वहाँ कोई भी नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती। 🚫👻
✨ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता: ✨
१. क्षेत्रपाल: किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता।
२. काल भैरव: सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के सबसे शक्तिशाली रक्षक!
३. भगवान नृसिंह: उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देव।
४. हनुमान जी: भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाले।
५. गरुड़ देव: विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से बचाने वाले।
६. माँ चामुंडा: तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी।
७. माँ प्रत्यंगिरा: काले जादू (अभिचार) और शत्रु बाधा का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।
८. नवदुर्गा: देवी के नौ रूप, जो हर दिशा से साधक के परिवार की रक्षा करते हैं।
९. कुबेर देव: उत्तर दिशा के रक्षक और सुख-समृद्धि के स्वामी।
१०. नाग देवता: भूमि और पाताल से जुड़े घर के अदृश्य रक्षक।
🔥 घर के चारों ओर 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाने की प्राचीन विधि: 🔥
आप स्वयं अपने घर को सुरक्षित करने के लिए यह सरल लेकिन अचूक प्रयोग कर सकते हैं:
🔹 पहला चरण: घर को अच्छी तरह साफ और पवित्र करें।
🔹 दूसरा चरण: पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान देवता से घर की रक्षा की प्रार्थना करें।
🔹 तीसरा चरण: घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम (रोली) का छिड़काव करें।
🔹 चौथा चरण: अपने घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर इस मंत्र का 21 बार जाप करें:
👉 "ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।"
🔹 पाँचवा चरण: अब आँखें बंद करके यह कल्पना (Visualization) करें कि आपके घर के चारों ओर एक अत्यंत तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है, जो पूरे घर को कवर कर रहा है। यही आपका 'तांत्रिक रक्षा कवच' है। 🛡️✨
🗓️ यह प्रयोग कब करें?
यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को बनाना सबसे फलदायी होता है। कोई भी नई साधना शुरू करने से पहले भी साधक यही विधि अपनाते हैं।
🔱 तंत्र का परम रहस्य: 🔱
जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ तांत्रिक अभिचार (काले जादू), प्रेत बाधा और बुरी नज़र का प्रभाव शून्य हो जाता है।
🚩 जय काल भैरव! 🚩
🚩 हर हर महादेव! 🚩

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