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26 Mar 2026

घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रचंड प्रयोग

🏠 घर की नकारात्मकता दूर करने का प्रचंड प्रयोग – बजरंग बाण से जल को करें अभिमंत्रित 🏠



नमस्ते दोस्तों,


अक्सर हम महसूस करते हैं कि घर में बिना वजह के वाद-विवाद बढ़ रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं। माहौल तनावपूर्ण रहता है। बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्ग परेशान रहते हैं। कोई बड़ी वजह नहीं होती, फिर भी घर में कलह बढ़ती जाती है। नकारात्मकता ऐसे घर कर जाती है जैसे हवा में घुल गई हो।


हम समझ नहीं पाते कि आखिर हो क्या रहा है। हम सोचते हैं – लोगों का स्वभाव खराब हो गया, या समय खराब चल रहा है, या कोई ग्रह दोष है। पर असल में यह सब नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होता है। जो घर में बिना बुलाए आ जाती है और धीरे-धीरे पूरे वातावरण को जहरीला बना देती है।


आज मैं आपको एक ऐसा प्रयोग बताने जा रहा हूँ जो बेहद सरल है, लेकिन इसका प्रभाव प्रचंड है। यह प्रयोग उन सभी घरों के लिए है जहाँ शांति लौटानी हो, जहाँ नकारात्मकता को जड़ से उखाड़ फेंकना हो।



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🔱 यह प्रयोग क्यों काम करता है?


बजरंग बाण हनुमान जी का वह स्तोत्र है जो स्वयं तुलसीदास जी ने रचा था। यह कोई साधारण स्तोत्र नहीं है। इसमें हनुमान जी की वह शक्ति समाई है जो रावण के लंका को जलाकर राख कर सकती है। जो समुद्र को लाँघ सकती है। जो संजीवनी बूटी ला सकती है। जो हर संकट को पल भर में दूर कर सकती है।


जब इस स्तोत्र की ऊर्जा को जल में स्थापित किया जाता है, तो वह जल उसी शक्ति से भर जाता है। और जब वह जल पूरे घर में छिड़का जाता है, तो हर उस नकारात्मक ऊर्जा को, हर उस तनाव को, हर उस कलह को जड़ से समाप्त कर देता है।


📿 पूरी विधि – स्टेप बाय स्टेप


पहला कदम – सामग्री इकट्ठा करें


इस प्रयोग के लिए आपको चाहिए –


✦ एक लोटा – मिट्टी का, तांबे का, या पीतल का

✦ एक कुशा – यह किसी भी मंदिर या पूजा की दुकान पर मिल जाता है

✦ बजरंग बाण का पाठ – 11 बार

✦ लाल आसन – बैठने के लिए


दूसरा कदम – जल को तैयार करें


एक लोटे में साफ पानी लें। उसमें एक कुशा डाल दें। कुशा पवित्रता का प्रतीक है। यह जल को और अधिक सात्विक बनाता है और ऊर्जा को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है।


तीसरा कदम – संकल्प लें


अब लोटे को अपने हाथों में लें। आँखें बंद करें और मन ही मन संकल्प लें –


"मैं संकल्प लेता हूँ कि इस लोटे के जल में मेरे द्वारा पढ़े जाने वाले बजरंग बाण की ऊर्जा स्थापित हो। यह जल प्रचंड होकर मेरे घर की सारी नकारात्मकता को नष्ट करे। घर में शांति स्थापित करे। मेरे परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़े।"


चौथा कदम – बजरंग बाण का पाठ करें


अब लाल आसन पर बैठ जाएँ। सामने हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति रखें। फिर 11 बार बजरंग बाण का पाठ करें।


पाठ करते समय ध्यान रखें कि आप जल को अभिमंत्रित कर रहे हैं। हर बार पाठ करने के बाद महसूस करें कि बजरंग बाण की ऊर्जा उस जल में उतर रही है। हर बार ऐसा लगे जैसे कोई प्रचंड शक्ति उस पानी में समा रही हो।


पाँचवाँ कदम – जल को घर में छिड़कें


जब 11 पाठ पूरे हो जाएँ, तो अब वह जल अभिमंत्रित हो चुका है। अब इसे पूरे घर में छिड़कें।


✦ पहले घर के मुख्य द्वार पर छिड़कें

✦ फिर हर कमरे में – एक-एक कोने में

✦ विशेष रूप से उन जगहों पर जहाँ अधिकतर झगड़े होते हैं, जहाँ तनाव रहता है

✦ घर के पूजा स्थान पर भी छिड़कें

✦ अंत में थोड़ा जल नहाने के पानी में मिला दें


छठा कदम – निरंतरता


इस प्रयोग को आप एक बार भी कर सकते हैं। लेकिन अगर घर में नकारात्मकता बहुत अधिक है, तो इसे लगातार 7 दिन या 11 दिन तक करें। हर दिन नया जल लें, नया कुशा डालें, और 11 बार बजरंग बाण पढ़कर जल अभिमंत्रित करें। फिर पूरे घर में छिड़कें।


💫 इस प्रयोग का प्रभाव


जब आप यह प्रयोग करेंगे, तो धीरे-धीरे आपको परिवर्तन दिखने लगेगा –


✦ पहले तो घर का माहौल हल्का होने लगेगा। जैसे कोई भारीपन हट गया हो।


✦ फिर छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े कम होने लगेंगे। लोग एक-दूसरे को समझने लगेंगे।


✦ घर में शांति छाने लगेगी। जैसे हर कोने में सुकून बिखर गया हो।


✦ बच्चे शांत रहने लगेंगे। बड़ों का मन हल्का रहेगा।


✦ पूजा स्थान की ऊर्जा भी शुद्ध होगी। घर में सकारात्मकता का प्रवाह शुरू होगा।


🌿 कुछ बातें याद रखें


✦ यह प्रयोग किसी के खिलाफ नहीं है। यह सिर्फ घर की नकारात्मक ऊर्जा को शुद्ध करने के लिए है।


✦ बजरंग बाण का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। जल को अभिमंत्रित कर रहे हैं, यह भाव रखें।


✦ यदि पूरा बजरंग बाण पढ़ना संभव न हो, तो हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ भी कर सकते हैं। लेकिन बजरंग बाण का प्रभाव अधिक प्रचंड होता है।


✦ इस प्रयोग के बाद घर में सकारात्मकता बनी रहे, इसके लिए प्रतिदिन कम से कम एक बार हनुमान चालीसा का पाठ करें।


🔥 एक गहरी बात


दोस्तों, घर की नकारात्मकता कोई बाहरी चीज नहीं होती। वह हमारे भीतर के तनाव, चिड़चिड़ापन, अधीरता से पैदा होती है। और फिर वह घर के हर कोने में फैल जाती है। बजरंग बाण की ऊर्जा उस नकारात्मकता को जड़ से उखाड़ फेंकती है। यही कारण है कि जब हम यह प्रयोग करते हैं, तो सिर्फ घर ही शांत नहीं होता, हमारा मन भी शांत होता है।



🙏 हनुमान जी की कृपा से घर में शांति और सकारात्मकता का वास हो 🙏


👇 क्या आपने कभी घर की नकारात्मकता दूर करने के लिए यह प्रयोग किया है? 


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17 Mar 2026

साधना क्या है भैरवी साधना #रहस्य भैरवी#चक्र साधना विधि

 #भैरवी #साधना क्या है भैरवी साधना #रहस्य भैरवी #चक्र साधना विधि  


https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE


#ब्रह्मांड में छिपी हुई तमाम प्रकार की शक्तियों को जानने और उन्हें प्राप्त करने के लिए अनेकों प्रकार के मार्ग वर्णित किए गए हैं इन शक्तियों को प्राप्त करने और जानने के लिए तंत्र मंत्र यंत्र भक्ति उपासना आराधना साधना आदि का उपयोग किया जाता है। 


https://youtube.com/@user-er1yu6br9z


किसी भी प्रकार की साधना करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग सोचते हैं समझते हैं दरअसल सभी प्रकार की साधनों में कहीं ना कहीं कठिनाई जरूर दिखाई देती है साधना ओं के दौरान व्यक्ति को अपने में काबू रखना जरूरी होता है तभी उसकी साधना सिद्ध हो सकती है।


https://youtu.be/_n0ECnDnLls


भैरवी साधना क्या है भैरवी साधना रहस्य भैरवी चक्र साधना विधि  


हमारी तंत्र मंत्र की साधनाओं में अनेकों प्रकार की विद्या भी सम्मिलित होती है और इन विद्याओं को सिद्ध करने के लिए मार्ग भी प्रशस्त किए गए हैं तंत्र-मंत्र और यंत्र की दुनिया में बहुत सारी महाविद्याए भी सम्मिलित की गई हैं जिनके अंतर्गत भैरवी साधना की विद्या की सम्मिलित हुई है।


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


तंत्र साधना में भैरवी साधना 10 महाविद्याओं में एक विद्या है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है भैरवी साधना करने से व्यक्ति के अंदर ब्रह्मांड में छिपी हुई अनेकों महा शक्तियों के विषय में व्यक्ति भी जानकार हो जाता है और वह एक प्रकार का त्रिकालदर्शी पुरुष या सिद्ध पुरुष बन जाता है।


https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y


भैरवी साधना या भैरवी पूजा एक ऐसी साधना का पूजा है जिसके माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री वासना के लिए नहीं बल्कि सत्य का एक उद्गम स्थान भी है यदि कोई भी व्यक्ति भैरवी साधना करना चाहता है तो उसको कोई योग गुरु है सिखा सकता है।


https://youtu.be/-_w_g7_08jU


भैरवी साधना दसमहाविद्या में माता भैरवी और भैरव भगवान शिव और पार्वती के रूप होते हैं अर्थात भगवान शिव के भैरव और पार्वती के भैरवी रूप की साधना ही भैरवी साधना कहलाती है।


 

भैरवी साधना का रहस्य क्या है ?


भैरवी साधना के वाममार्गी शाखा में देह को साधना को आधार मानकर तंत्र साधना की जाती है हमारे शरीर में स्थित देवताओं की संपूर्ण शक्तियां जिस ऊर्जा के साथ होती हैं उन को जागृत करने के लिए साधना प्रथम चरण होता है उसे भगवान के द्वारा प्राप्त शरीर से भगवान की शक्तियों को जाना जाता है.


हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के संस्कारों और अनेक वासनाओं का होना पाया जाता है

भैरवी साधना के अंतर्गत शरीर में जितनी भी वासनाएं होती हैं उन्हें निर्वस्त्र होकर शरीर से बाहर किया जाता है।


भैरवी साधना का मुख्य उद्देश्य क्या है ?


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी साधना का प्रमुख उद्देश्य हमारे शरीर में स्थित काम ऊर्जा की शक्ति के द्वारा संसार को विस्मृत करके परम आनंद की अनुभूति करना है भैरवी साधना कई चरणों में संपन्न होती है.


भैरवी साधना के चरण क्या है ?


भैरवी साधना को कई चरणों में सिद्ध करने की प्रक्रिया है क्योंकि यह साधना स्त्री और पुरुष दोनों के सानिध्य में होती हैं या कोई पुरुष और स्त्री अकेले भी करता है ऐसे में साधना के कई चरण हो जाते हैं।


1. भैरवी साधना का पहला चरण


भैरवी साधना के पहले चरण में स्त्री पुरुष जो भी साधक हैं उनको एकांत और सुगंधित वातावरण में निर्वस्त्र होकर आमने-सामने कम से कम 3 फुट की दूरी पर सुखासन या पद्मासन लगाकर बैठे और एक दूसरे की ओर आंखों में देखते हुए मंत्र जाप करें.


इस प्रकार की साधना के दौरान साधक के अंदर धीरे धीरे निरंतर काम भाव ऊर्ध्वगामी होकर दिव्य ऊर्जा के रूप में सहस्त्रदल का भेदन कर देता है।


2. भैरवी साधना का दूसरा चरण 


भैरवी साधना का दूसरा चरण स्त्री पुरुष जो साधक हैं एक दूसरे के करीब आकर अंग प्रत्यंगो को स्पर्श करते हुए उत्तेजित काम भावना को स्थाई बनाते हैं।


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


साधना के दौरान बीच-बीच में मंत्रों का उच्चारण करते रहने से कामोत्तेजना की बाहरी क्रियाओं को करना होता है परंतु काम उत्तेजना के दौरान स्खलन होने को रोकते हुए आत्म संयम रखें


3. भैरवी साधना का अंतिम चरण 


भैरवी साधना के अंतिम चरण में साधक स्त्री या पुरुष परस्पर संभोग की क्रिया करते हैं परंतु समान भाव समान श्रद्धा और उत्साह तथा संयम से शारीरिक भूख थी साधना करते हैं। ना कि इस चरण में साधक स्त्री पुरुष निसंकोच होकर संभोग की क्रिया मंत्र जाप करते हुए करें।


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


साधना के दौरान जब संभोग किया कर रहे हैं तो आप संयम रखते हुए प्रयास करें कि दोनों का इस खनन एक साथ हो यदि एक साथ नहीं हो रहा है तो लगभग एक साथ संपन्न हो।


भैरवी साधना की विधि | 


भैरवी साधना करने के लिए साधक को नवरात्रि के दिनों में शुक्ल पक्ष के सोमवार या शुक्रवार से प्रारंभ करना चाहिए। इसके अलावा इस साधना को करने के लिए रात्रि के 9 बजे के बाद समय ज्यादा उचित है।


साधना में लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर अपनी पूजा कक्ष या एकांत स्थान पर पूर्व की ओर मुंह करके बैठे। उसके बाद अपने सामने लाल आसन पर एक चौकी बनाएं और उस पर भगवान शिव तथा अपने गुरु का फोटो लगाएं इसके बाद रोली से कमला यंत्र स्थापित करें घी का दीपक जलाकर यंत्र की पूजा अर्चना करें। पूजा अर्चना करने के बाद क्रमशः संकल्प नियोग करें।


https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी साधना के दौरान संकल्प विनियोग किस प्रकार से पढ़े ?


भैरवी साधना के दौरान संकल्प विनियोग पढ़ना जरूरी है अतः ऐसे में आप भैरवी साधना के संकल्प


 विनियोग इस प्रकार से पढ़ें.


ॐ अस्य श्री त्रिपुर भैरवी मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि: पंक्तिश्छ्न्द: त्रिपुर भैरवी देवता वाग्भवो बीजं शक्ति बीजं शक्ति: कामराज कीलकं श्रीत्रिपुरभैरवी प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:


1. ऋष्यादि न्यास


इस संकलन में बाएं हाथ से जल लेकर दाहिने हाथ से संबंध पांचों उंगलियों से नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करते हुए अंगों को स्पर्श करें


दक्षिणामूर्तये ऋषये नम: शिरसि ( सर को स्पर्श करें )

पंक्तिच्छ्न्दे नम: मुखे ( मुख को स्पर्श करें )

श्रीत्रिपुरभैरवीदेवतायै नम: ह्रदये ( ह्रदय को स्पर्श करें )

वाग्भवबीजाय नम: गुहे ( गुप्तांग को स्पर्श करें )

शक्तिबीजशक्तये नम: पादयो: ( दोनों पैरों को स्पर्श करें )

कामराजकीलकाय नम: नाभौ ( नाभि को स्पर्श करें )

विनियोगाय नम: सर्वांगे ( पूरे शरीर को स्पर्श करें )


2. कर न्यास 


अपने दोनों हाथों के अंगूठे से हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करते हुए चेतना को प्राप्त करें और यह मंत्र जाप करें


हस्त्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।

ह्स्त्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।

हस्त्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।

हस्त्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।


3. ह्र्दयादि न्यास


हस्त्रां ह्रदयाय नम: ।

हस्त्रां शिरसे स्वाहा ।

ह्स्त्रूं शिखायै वषट् ।

हस्त्रां कवचाय हुम् ।

ह्स्त्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

हस्त्र: अस्त्राय फट् ।


भैरवी की पूजा कैसे करें ? 

 


उधदभानुसहस्त्रकान्तिमरूणक्षौमां शिरोमालिकां,

रक्तालिप्रपयोधरां जपवटी विद्यामभीतिं परम् ।

हस्ताब्जैर्दधतीं भिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं,

देवी बद्धहिमांशुरत्नस्त्रकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ।।


भैरवी ध्यान


हं हं हं हंस हंसी स्मित कह कह चामुक्त घोर अट्टहासा।


खं खं खं खड्गहस्ते त्रिभुवन निलये कालभैरवी कालधारी।।


रं रं रं रंगरंगी प्रमुदित वदने पिर्घैंकेषी श्मशाने।

यं रं लं तापनीये भ्रकुटि घट घटाटोप, टंकार जापे।।


हं हं हंकारनादं नर पिषितमुखी संधिनी साध्रदेवी।

ह्रीं ह्रीं ह्रीं कुष्माण्ड मुण्डी वर वर ज्वालिनी पिंगकेषी कृषांगी।।


खं खं खं भूत नाथे किलि किलि किलिके एहि एहि प्रचण्डे।


ह्रुम ह्रुम ह्रुम भूतनाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते।।

भां भां भां भावैर्भय हन हनितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री।


भीं भीं भीं भीमकाक्षिर्गुण गुणित गुहावास भोगी सभोगी।।


भूं भूं भूं भूमिकम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे।

भें भें भें भेदनीये हरतु मम भयं भैरव्ये त्वां नमस्ते।।


हां हां हाकिनी स्वरूपिणी भैरवी क्षेत्रपालिनी।

कां कां कां कानिनी स्वरूपा भैरवी व्याधिनाशिनी।।


रां रां रां राकिनी स्वरूपा भैरवी शत्रुमर्द्दिनी।

लां लां लां लाकिनी स्वरूपा भैरवी दुःख दारिद्रनाषिनी।।


भैं भैं भैं भ्रदकालिके क्रूर ग्रह बाधा निवारिणी।

फ्रैं फ्रैं फ्रैं नवनाथात्मिके गूढ़ ज्ञानप्रदायिनि।।


ईं ईं ईं रूद्रभैरवी स्वरूपा रूद्रग्रंथिभेदिनि।

उं उं उं विश्णुवामांगे स्थिता विष्णु ग्रंथि भेदिनी।


च्लूं च्लूं च्लूं नीलपताके सर्वसिद्धि प्रदायिनी ।

अं अं अं अंतरिक्षे सर्वदानव ग्रह बंधिनी।।


स्त्रां स्त्रां स्त्रां सप्तकोटि स्वरूपा आदिव्याधि त्रोटिनी।


क्रों क्रों क्रों कुरूकुल्ले दुष्ट प्रयोगान नाशिनी।।


ह्रीं ह्रीं ह्रीं अंबिके भोग मोक्ष प्रदायिनी।

क्लीं क्लीं क्लीं कामुके कामसिद्धि दायिनी।।


उपरोक्त मंत्रों के साथ पूजन करने के बाद मूंगा की माला लेकर 11 दिनों तक 23 माला जाप करें और एक 23 दिनों तक 63 माला जाप करें


इस मंत्र को पढ़ते हुए जाप करें


॥ ह सें ह स क रीं ह सें ॥


॥ ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥


भैरवी मंत्र


‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:’


उपरोक्त मंत्रों के बाद इस मंदिर का भी जाप कर सकते हैं

।। ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।।

।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।।

।। ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।।


भैरवी साधना से सिद्ध होने के बाद क्या होता है ?


 सिद्ध हो जाने के बाद साधक त्रिकालदर्शी की तरह ब्रह्मांड का ज्ञाता हो जाता है और ब्रह्मांड में भूलने वाले सभी प्रकार के मंत्र उसे सुनाई देने लगते हैं दिव्य प्रकाश दिखाई देता है और आजीवन कामवासना से मुक्त हो जाता है मन स्थिर होकर शांत हो जाता है तथा चेहरे पर एक अलौकिक तेज दिखाई देता है .


 https://youtu.be/oEgcOGBbUz8


भैरवी-साधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैं, दिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक काम-वासना जागृत नहीं होती । साथ ही उसका मन शान्त व स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है।


 चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।



https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE

https://youtu.be/_n0ECnDnLls

https://youtu.be/oEgcOGBbUz8

https://youtu.be/_n0ECnDnLls

https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y

https://youtu.be/-_w_g7_08jU


#BureGunoSeDoor #NaitikJeevan #https://youtu.be/tuYEhj4Cn-Y

https://youtu.be/6Aj5hMGeaGE

https://youtu.be/_n0ECnDnLls

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ईश्वर की कृपा ओर उस पर अतुट श्रद्धा संत मलूक दास जी

 


महान संत मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा— "अगर ईश्वर कण-कण में है, तो क्या वो मुझे इस निर्जन जंगल में भी ढूंढ लेगा? क्या वो मुझे बिना मांगे खिलाएगा?"


वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ 

पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी— "न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है!"


शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने कुदरत के पहिये घुमा दिए! राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले।


अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार लुटेरे आ धमके


मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी।

तभी झाड़ियों के पीछे से खूंखार डाकुओं का एक गिरोह निकला। उनकी तलवारें चमक रही थीं। जब उन्होंने निर्जन जंगल में सोने-चाँदी के बर्तनों में सजा राजसी खाना देखा, तो वे ठिठक गए।

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डाकुओं के सरदार ने गरजकर कहा, "रुको! यह कोई चाल लगती है। इस वीरान जंगल में इतना कीमती खाना और कोई इंसान नहीं? पक्का इसमें जहर मिलाया गया है ताकि हमें मारकर हमारा माल लूटा जा सके।"

तभी एक डाकू की नजर ऊपर बरगद के घने पत्तों पर पड़ी। उसने चिल्लाकर कहा, "सरदार! ऊपर देखो, कोई छिपा है! जरूर इसी ने यह जाल बिछाया है।"


डाकुओं ने मलूक दास जी को नीचे उतारा। वे भूख से निढाल थे, चेहरा पीला पड़ चुका था, लेकिन आँखों में वही 'हठ' और ईश्वर को आजमाने की चमक थी।

सरदार ने मलूक दास की गर्दन पर नंगी तलवार रख दी और दहाड़कर बोला:

 "ए ढोंगी! सच बता, इस खाने में जहर है न? तू चाहता है कि हम इसे खाएं और मर जाएं? अब देख, तू ही इस खाने को पहले खाएगा। अगर तूने मना किया, तो इसी पल तेरा सिर धड़ से अलग कर दूँगा!"

मलूक दास जी मन ही मन मुस्कुराए। उनकी शर्त थी— "न हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा।"

उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया और गर्दन झुका ली। यह देख डाकू और भड़क गए। उन्हें लगा कि मलूक दास मरने से डर रहा है क्योंकि खाने में वाकई जहर है। सरदार ने अपने दो गुर्गों को हुक्म दिया, "इसका मुँह जबरदस्ती खोलो और इसके गले के नीचे यह खाना उतारो!"

अगले ही पल, दो बलवान डाकुओं ने मलूक दास जी के हाथ पकड़े, एक ने उनका जबड़ा जबरदस्ती खोला और तीसरा शख्स बड़े-बड़े ग्रास उनके मुँह में ठूंसने लगा। मलूक दास जी हिल भी नहीं रहे थे, और डाकू उन्हें 'सजा' देने के लिए जबरन खिला रहे थे।


जब मलूक दास जी का पेट भर गया, तब उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा और दिल ही दिल में कहा:

"वाह रे मेरे मालिक! क्या गजब का इंतजाम है। मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था, तो तूने डाकुओं को मेरा हाथ पकड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने मौत का डर दिखाकर मेरा मुँह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है, और खिलाने के लिए 'नौकर' भी भेजता है!"


मलूक दास जी की यह हालत देखकर डाकू सहम गए। उन्हें समझ आ गया कि यह कोई अपराधी नहीं, बल्कि कोई सिद्ध महात्मा है। वे उनके चरणों में गिर पड़े।


मलूक दास जी इसी घटना के बाद नीचे उतरे और उन्होंने वह प्रसिद्ध दोहा रचा जो आज भी अमर है:

"अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।

दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥"

इसका अर्थ यह नहीं कि हम कर्म न करें, बल्कि यह है कि जब इंसान अपना अहंकार त्याग कर पूरी तरह उस परमात्मा पर निर्भर हो जाता है, तो पूरी सृष्टि उसे सँभालने में लग जाती है। हम अपनी मेहनत के भरोसे जरूर हैं, लेकिन वह मेहनत करने की शक्ति भी उसी 'ऊर्जा' से आती है।

13 Mar 2026

મહાકાલી માતાજી સ્ત્રોત કિલકમ

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क्या आपने कभी “काली कीलकम्” का नाम सुना है?

तंत्र शास्त्र कहता है 

बिना कीलक के मंत्र और साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला।

यही वह गुप्त तांत्रिक सूत्र है जिससे

साधक की रक्षा होती है,

दरिद्रता मिटती है,

और माँ काली की कृपा से जीवन के द्वार खुलते हैं।

आज पहली बार Mahakali Tantra में

इस अद्भुत रहस्य की झलक।

🔱 पढ़ें और अनुभव करें।


क्या आप जानते हैं कि आपकी कठिन साधना, मंत्र जप और कवच पाठ निष्फल क्यों हो जाते हैं? तंत्र का एक अटल सत्य है बिना 'कीलक' के साधना वैसी ही है जैसे बिना चाबी के ताला!


स्वयं भगवान शिव ने स्वीकारा है कि देवी काली ही 'परतत्त्व' हैं। लेकिन उनके तेज को प्राप्त करने के लिए जिस चाबी की आवश्यकता है, वह है काली कीलकम्। यह मात्र एक स्तोत्र नहीं, बल्कि वह दिव्य ऊर्जा है जिसने दुर्वासा, वशिष्ठ और देवगुरु बृहस्पति जैसे ऋषियों को ऐश्वर्य के शिखर पर पहुँचाया।


॥ श्री काली कीलकम् ॥

विनियोग:

ॐ अस्य श्री कालिका कीलकस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टप् छन्दः, श्री दक्षिण कालिका देवता, सर्वार्थ सिद्धि साधने कीलक न्यासे जपे विनियोगः ।


कीलक महिमा:

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीलकं सर्वकामदम् ।

कालिकायाः परं तत्त्वं सत्यं सत्यं त्रिभिर्ममः ॥

दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।

सुरेशो धनदश्चैव अङ्गराश्च भृभूद्वाहः ॥

च्यवनः कार्तवीर्यश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।

कीलकस्य प्रसादेन सर्वैश्वर्चमवाप्नुयुः ॥

अथ काली कीलकम्:

ॐ कारं तु शिखाप्रान्ते लम्बिका स्थान उत्तमे ।

सहस्त्रारे पङ्कजे तु क्रीं क्रीं वाग्विलासिनी ॥

कूर्चबीजयुगं भाले नाभौ लज्जायुगं प्रिये ।

दक्षिणे कालिके पातु स्वनासापुट युग्मके ॥

हूंकारद्वन्द्वं गण्डे द्वे द्वे माये श्रवणद्वये ।

आद्यातृतीयं विन्यस्य उत्तराधर सम्पुटे ॥

स्वाहा दशनमध्ये तु सर्व वर्णन्न्यसेत् क्रमात् ।

मुण्डमाला असिकरा काली सर्वार्थसिद्धिदा ॥

चतुरक्षरी महाविद्या क्रीं क्रीं हृदय पङ्कजे ।

ॐ हूं ह्नीं क्रीं ततो हूं हट् स्वाहा च कंठकूपके ॥

अष्टाक्षरी कालिकाया नाभौ विन्यस्य पार्वति ।

क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहान्ते च दशाक्षरी ॥

मम बाहु युगे तिष्ठ मम कुण्डलिकुण्डले ।

हूं ह्नीं मे वह्निजाया च हूं विद्या तिष्ठ पृष्ठके ॥

क्रीं हूं ह्नीं वक्षदेशे च दक्षिणे कालिके सदा ।

क्रीं हूं ह्नीं वह्निजायाऽन्ते चतुर्दशाक्षरेश्वरी ॥

क्रीं तिष्ठ गुह्यदेशे मे एकाक्षरी च कालिका ।

ह्नीं हूं फट् च महाकाली मूलाधार निवासिनी ॥

सर्वरोमाणि मे काली करांगुल्यङ्क पालिनी ।

कुल्ला कटिं कुरुकुल्ला तिष्ठ तिष्ठ सदा मम ॥

विरोधिनी जानुयुग्मे विप्रचित्ता पदद्वये ।

तिष्ठ मे च तथा चोग्रा पादमूले न्यसेत्क्रमात् ॥

प्रभा तिष्ठतु पादाग्रे दीप्ता पादांगुलीनपि ।

नीली न्यसेद्विन्दु देशे घना नादे च तिष्ठ मे ॥

वलाका विन्दुमार्गे च न्यसेत्सर्वाङ्ग सुन्दरी ।

मम पातालके मात्रा तिष्ठ स्वकुल कायिके ॥

मुद्रा तिष्ठ स्वमत्येमां मितास्वङ्गाकुलेषु च ।

एता नृमुण्डमालास्त्रग्धारिण्य: खड्‌गपाणयः ॥

तिष्ठन्तु मम गात्राणि सन्धिकूपानि सर्वशः ।

ब्राह्मी च ब्रह्मरंध्रे तु तिष्ठ स्व घटिका परा ॥

नारायणी नेत्रयुगे मुखे माहेश्वरी तथा ।

चामुण्डा श्रवणद्वन्द्वे कौमारी चिबुके शुभे ॥

तथामुदरमध्ये तु तिष्ठ मे चापराजिता ।

वाराही चास्थिसन्धौ च नारसिंही नृसिंहके ॥

आयुधानि गृहीतानि तिष्ठस्वेतानि मे सदा ।

फलश्रुति:

इति ते कीलकं दिव्यं नित्यं यः कीलयेत्स्वकम् ॥

कवचादौ महेशानि तस्यः सिद्धिर्न संशयः ।

श्मशाने प्रेतयोर्वापि प्रेतदर्शनतत्परः ॥

यः पठेत्पाठयेद्वापि सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।

सवाग्मी धनवान्दक्षः सर्वाध्यक्ष: कुलेश्वर: ॥

पुत्र बांधव सम्पन्नः समीर सदृशो बले ।

न रोगवान् सदा धीरस्तापत्रय निषूदनः ॥

मुच्यते कालिका पायात् तृणराशिमिवानला ।

न शत्रुभ्यो भयं तस्य दुर्गमेभ्यो न बाध्यते ॥

यस्य य देशे कीलकं तु धारणं सर्वदाम्बिके ।

तस्य सर्वार्थसिद्धि: स्यात्सत्यं सत्यं वरानने ॥

मंत्रच्छतगुणं देवि कवचं यन्मयोदितम् ।

तस्माच्छतगुणं चैव कीलकं सर्वकामदम् ॥

तथा चाप्यसिता मंत्रं नील सारस्वते मनौ ।

न सिध्यति वरारोहे कीलकार्गलके विना ॥

विहीने कीलकार्गलके काली कवच यः पठेत् ।

तस्य सर्वाणि मंत्राणि स्तोत्राण्यन सिद्धये प्रिये ॥

॥ काली कीलकम् समाप्त ॥


काली कीलकम् के अद्भुत लाभ 

  सुरक्षा चक्र: इसके पाठ से शरीर के रोम-रोम की रक्षा होती है। हिंसक पशु या शत्रु आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकते।

  सफलता की कुंजी: मंत्र जाप से 100 गुना अधिक फल कवच का है, और कवच से 100 गुना अधिक प्रभाव इस कीलक का है।

  दरिद्रता का नाश: यह पाठ साधक को कुबेर के समान ऐश्वर्यवान और समाज में सम्मानित बनाता है।

  रोग मुक्ति: भयंकर रोगों और अकाल मृत्यु के भय को जड़ से मिटा देता है।


सामान्य सिद्ध विधि (जनसाधारण के लिए) 🚩

 किसी भी शुक्रवार या अमावस्या की रात्रि से पाठ आरंभ करें।

 दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काली माँ की प्रतिमा या यंत्र के समक्ष दीपक जलाएं।

 सर्वप्रथम विनियोग करें, फिर श्रद्धापूर्वक 'काली कीलकम्' का 11 बार पाठ करें।

  पाठ के बाद माँ काली से अपनी मनोकामना कहें। यह सरल विधि भी आपको चमत्कारिक अनुभव कराएगी।


⚠️ सावधान! क्या आप जानते हैं इसके 'गुप्त और लुप्त' प्रयोग?

काली कीलकम् मात्र एक पाठ नहीं है, इसके भीतर स्तम्भन, वशीकरण, उच्चाटन और मारण जैसी प्रचंड तांत्रिक क्रियाओं के सूत्र छिपे हैं।

  कैसे एक विशेष मुद्रा के साथ इसका पाठ करने से शत्रु स्वतः घुटने टेक देता है?

 कैसे इसके विशिष्ट न्यास से कुंडलिनी शक्ति को तीव्र गति से जागृत किया जा सकता है?

 कैसे श्मशान साधना में इसका प्रयोग कर प्रत्यक्ष दर्शन संभव हैं?

ये वे रहस्य हैं जो सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा में गुप्त रखे गए हैं। यदि आप तंत्र की पराकाष्ठा को छूना चाहते हैं और इन लुप्त प्रयोगों को सिद्ध करना चाहते हैं, तो आज ही इस महाअभियान का हिस्सा बनें।

"अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ें, महाकाली के शरणागत हों।"


 इन गुप्त प्रयोगों को सीखने और अपने जीवन को पूर्णतः बदलने के लिए आज ही 'Mahakali Tantra' ज्वाइन करें!


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12 Mar 2026

64 योगिनी पूजा विधि

 🌹शिवजी से प्रगट हुये। 64 तंत्र ओर हरेक तंत्र की अधिष्ठात्री देवी है 64 योगिनी।🌹


महादानव घोर को पराजित करने महाकाली की शक्तियां बनकर घोर को पराजित किया वो योगिनी शक्तियां है । ब्रह्मांड का केंद्र शिव है इस केंद्र के वर्तुल् में हर दिशामे व्याप्त है 64 योगिनी शक्ति । इसलिए ही योगिनी मंदिर वर्तुलाकार होते है । केंद्रमें शिवलिंग स्थापित होता है । शिवाराधना स्वरूप योगिनियो का मुख शिवलिंग तरफ अंदर की ओर होता है और शिवतंत्र शक्तिसे ब्रह्मांडमें व्याप्त स्वरूप योगिनियो का मुख बाहर की तरफ होता है । 64 योगिनियो को तंत्र मार्ग ओर वैदिक उपासना मार्गमें अलग अलग नाम से पूजा जाता है । एक संपूर्ण पुरुष 32 कलाओ से युक्त होता है वही एक संपूर्ण स्त्री भी 32 कलाओ से युक्त होती है , दोनों के मिलन से बनते है 32 + 32 = 64, ऐसे है 64 योगिनी शिव और शक्ति जो सम्पूर्ण कलाओ से युक्त हैं , उनके मिलन से प्रगट हुई हैं । चौसठ योगिनियों की पूजा करने से सभी देवियों की पूजा हो जाती है। इन चौंसठ देवियों में से दस महाविद्याएं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है। ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतार रूप हैं। कुछ लोग कहते हैं कि समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं।


हर दिशा में 8 योगिनी फ़ैली हुई है, हर योगिनी के लिए एक सहायक योगिनी है, हिसाब से हर दिशा में 16 योगिनी हुई तो 4 दिशाओ में 16 × 4 = 64 योगिनी हुई । ६४ योगिनी ६४ तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। एक देवी की भी कृपा हो जाये तो उससे संबंधित तन्त्र की सिद्धी मानी जाती है।वैदिक परम्परामे 64 योगिनि :- १.बहुरूप, २.तारा, ३.नर्मदा, ४.यमुना, ५.शांति, ६.वारुणी, ७.क्षेमंकरी, ८.ऐन्द्री, ९.वाराही १०.रणवीरा, ११.वानर-मुखी, १२.वैष्णवी, १३.कालरात्रि, १४.वैद्यरूपा, १५.चर्चिका, १६.बेतली १७.छिन्नमस्तिका, १८.वृषवाहन, १९.ज्वाला कामिनी, २०.घटवार, २१.कराकाली, २२.सरस्वती, २३. बिरूपा, २४.कौवेरी, २५.भलुका, २६.नारसिंही, २७.बिरजा, २८.विकतांना, २९.महालक्ष्मी, ३०.कौमारी, ३१.महामाया, ३२.रति, ३३.करकरी, ३४.सर्पश्या, ३५.यक्षिणी, ३६.विनायकी, ३७.विंद्यावालिनी, ३८.वीर कुमारी, ३९.माहेश्वरी, ४०.अम्बिका, ४१.कामिनी, ४२. घटाबरी, ४३. स्तुती, ४४. काली, ४५. उमा, ४६.नारायणी, ४७.समुद्र, ४८.ब्रह्मिनी, ४९.ज्वालामुखी, ५०.आग्नेयी, ५१.अदिति, ५२.चन्द्रकान्ति, ५३. वायुवेगा, ५४.चामुण्डा, ५५.मूरति, ५६.गंगा, ५७.धूमावती, ५८.गांधार, ५९.सर्व मंगला, ६०.अजिता, ६१.सूर्य पुत्री, ६२.वायु वीणा, ६३.अघोर और ६४.भद्रकाली हैं। शीघ्र फलदायी योगिनी उपसनामे 8 प्रमुख योगिनी की विविध फल प्राप्ति हेतु अलग अलग विधान उपासना है पर यहां सभी 64 योगिनियो का एक ही उपासना विधान प्रस्तुत करते है ।


64 योगिनियों की साधना सोमवार अथवा अमावस्या/ पूर्णिमा की रात्रि से आरंभ की जाती है। साधना आरंभ करने से पहले स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर अपने पितृगण, इष्टदेव तथा गुरु का आशीर्वाद लें। तत्पश्चात् गणेश मंत्र तथा गुरुमंत्र का जप किया जाता है ताकि साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न न आएं। इसके बाद भगवान शिव का पूजा करते हुए शिवलिंग पर जल तथा अष्टगंध युक्त अक्षत (चावल) अर्पित करें। इसके बाद आपकी पूजा आरंभ होती है। एक चौरंग पर लाल वस्त्र पर अक्षत रखकर उन पर योगिनियंत्र या फिर 64 सुपारी स्थापित करे । पंचोपचार पूजन करे । फिर 64 योगिनियो के मंत्र जप करे । हरेक मंत्र की एक माला जप करे । अंत में जिस भी योगिनि को सिद्ध करना चाहते हैं, उसके मंत्र की कम से कम 11 ग्यारह माला (1100 मंत्र) जप करें।


64 योगिनियों के मंत्र ; –


(1) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा।


(2) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा।


(3) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा।


(4) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा।


(5) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा।


(6) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा।


(7) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा।


(8) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा।


(9) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा।


(10) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा।


(11) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा।


(12) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा।


(13) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा।


(14) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा।


(15) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा।


(16) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा।


(17) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा।


(18) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा।


(19) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा।


(20) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा।


(21) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा।


(22) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा।


(23) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा।


(24) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा।


(25) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा।


(26) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा।


(27) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा।


(28) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा।


(29) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा।


(30) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा।


(31) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा।


(32) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा।


(33) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा।


(34) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा।


(35) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा।


(36) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा।


(37) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा।


(38) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा।


(39) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा।


(40) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा।


(41) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा।


(42) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा।


(43) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा।


(44) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा।


(45) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा।


(46) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा।


(47) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा।


(48) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा।


(49) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा।


(50) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा।


(51) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा।


(52) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा।


(53) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा।


(54) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा।


(55) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा।


(56) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा।


(57) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा।


(58) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा।


(59) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा।


(60) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा।


(61) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा।


(62) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा।


(63) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा।


(64) ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा।


मंत्र जाप के बाद योगिनी स्तोत्र पाठ करे ।


चतुष्षष्टि-योगिनी नाम-स्तोत्रम्


गजास्या सिंह-वक्त्रा च, गृध्रास्या काक-तुण्डिका ।


उष्ट्रा-स्याऽश्व-खर-ग्रीवा, वाराहास्या शिवानना ।।


उलूकाक्षी घोर-रवा, मायूरी शरभानना ।


कोटराक्षी चाष्ट-वक्त्रा, कुब्जा च विकटानना ।।


शुष्कोदरी ललज्जिह्वा, श्व-दंष्ट्रा वानरानना ।


ऋक्षाक्षी केकराक्षी च, बृहत्-तुण्डा सुराप्रिया ।।


कपालहस्ता रक्ताक्षी च, शुकी श्येनी कपोतिका ।


पाशहस्ता दंडहस्ता, प्रचण्डा चण्डविक्रमा ।।


शिशुघ्नी पाशहन्त्री च, काली रुधिर-पायिनी ।


वसापाना गर्भरक्षा, शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ।।


ऋक्ष-केशी महा-कुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका ।


दन्द-शूक-धरा क्रौञ्ची, मृग-श्रृंगा वृषानना ।।


फाटितास्या धूम्रश्वासा, व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका ।


तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ।।


विद्युल्लोला वलाकास्या, मार्जारी कटपूतना ।


अट्टहास्या च कामाक्षी, मृगाक्षी चेति ता मताः ।।


स्तोत्र पाठ के बाद वेदी में ( छोटा यज्ञ कुंडी ) में अग्नि स्थापन करे और सभी 64 योगिनी के नाम के स्मरण करते हुवे 11 आहुति दीजिए ।( शुद्ध घी से या फिर हवन द्रव्य से आहुति दे )


प्रत्येक नाम के आदि में ‘ॐ’ तथा अन्त में स्वाहा लगाकर हवन करें –


१॰ ॐ गजास्यै स्वाहा, २॰ सिंह-वक्त्रायै, ३॰ गृध्रास्यायै, ४॰ काक-तुण्डिकायै , ५॰ उष्ट्रास्यायै, ६॰ अश्व-खर-ग्रीवायै, ७॰ वाराहस्यायै, ८॰ शिवाननायै, ९॰ उलूकाक्ष्यै, १०॰ घोर-रवायै, ११॰ मायूर्यै, १२॰ शरभाननायै, १३॰ कोटराक्ष्यै, १४॰ अष्ट-वक्त्रायै, १५॰ कुब्जायै, १६॰ विकटाननायै, १७॰ शुष्कोदर्यै, १८॰ ललज्जिह्वायै, १९॰ श्व-दंष्ट्रायै, २०॰ वानराननायै, २१॰ ऋक्षाक्ष्यै, २२॰ केकराक्ष्यै, २३॰ बृहत्-तुण्डायै, २४॰ सुरा-प्रियायै, २५॰ कपाल-हस्तायै, २६॰ रक्ताक्ष्यै, २७॰ शुक्यै, २८॰ श्येन्यै, २९॰ कपोतिकायै, ३०॰ पाश-हस्तायै, ३१॰ दण्ड-हस्तायै, ३२॰ प्रचण्डायै, ३३॰ चण्ड-विक्रमायै, ३४॰ शिशुघ्न्यै, ३५॰ पाश-हन्त्र्यै, ३६॰ काल्यै, ३७॰ रुधिर-पायिन्यै, ३८॰ वसा-पानायै, ३९॰ गर्भ-भक्षायै, ४०॰ शव-हस्तायै, ४१॰ आन्त्र-मालिकायै, ४२॰ ऋक्ष-केश्यै, ४३॰ महा-कुक्ष्यै, ४४॰ नागास्यायै, ४५॰ प्रेत-पृष्ठकायै, ४६॰ दन्द-शूक-धरायै, ४७॰ क्रौञ्च्यै, ४८॰ मृग-श्रृंगायै, ४९॰ वृषाननायै, ५०॰ फाटितास्यायै, ५१॰ धूम्र-श्वासायै, ५२॰ व्योम-पादायै, ५३॰ ऊर्ध्व-दृष्टिकायै, ५४॰ तापिन्यै, ५५॰ शोषिण्यै, ५६॰ स्थूल-घोणोष्ठायै, ५७॰ कोटर्यै, ५८॰ विद्युल्लोलायै, ५९॰ बलाकास्यायै, ६०॰ मार्जार्यै, ६१॰ कट-पूतनायै, ६२॰ अट्टहास्यायै, ६३॰ कामाक्ष्यै, ६४॰ मृगाक्ष्यै ।


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इस के बाद योगिनी यंत्र स्थापन ओर भगवान शिव की आरती करें । पूजा के बाद क्षमापना प्रार्थना करे ।


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव l


आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं ।


साधना समाप्त होने के बाद शिवलिंग पर चढ़ाएं चावल अलग से रख लें तथा अगले दिन बहते जल यथा नदी में प्रवाहित कर दें। ये उपासना 21 रात्रि तक करनी है । योगिनी देवी की माता स्वरूप ही उपासना करें । उपासना पूर्ण होने के बाद यंत्र या मूर्ति या सुपारी में स्थापना की हो वो सिद्ध हो जाएगा । चौरंग पर स्थापित उसी लाल वस्त्रम बांधकर अल्मारीमे रख दीजिए । ये उपासना के बाद जीवनमे कोई कमी नही रहेगी । बचपन से लेकर आजतक जो भी सपने देखे हो सच हो जाएँगे । हरेक समस्या स्वयम ही नाश हो जाएगी । कभी बीच उपसनामे ही कोई योगिनी प्रगट हो जाय तो वंदन किजीये पर कुछ मांगना नही । वो कहे तो भी विनंती कीजिये कि 21 दिन पूरे होने पर आप प्रसन्न रहिए । 21 वे दिन जब साधना पूर्ण हो तब दंडवत प्रणाम कीजिये और फिर जीवनमे जो भी पाना चाहते हो वो योगिनी माताओं से निवेदन कीजिये । सतयुग से आजतक महान सिद्धयोगीओ ने इस योगिनी शक्तिओ से ही अनेक सिद्धि प्राप्त की है

8 Mar 2026

रक्षा कवच घर के लिये

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घर की रक्षा करने वाले तांत्रिक देवता और तांत्रिक रक्षा कवच की प्राचीन विधि

तंत्र और आगम परंपरा में माना गया है कि प्रत्येक स्थान केवल भौतिक रूप से ही नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जा से भी प्रभावित होता है। इसी कारण प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना तथा तांत्रिक रक्षा कवच बनाया जाता था।

तंत्र ग्रंथों में बताया गया है कि यदि किसी स्थान पर वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा बनी रहे तो वह स्थान एक अदृश्य दिव्य सुरक्षा मंडल से घिर जाता है और नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ प्रवेश नहीं कर पातीं।

घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता


क्षेत्रपाल – किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता माने जाते हैं।


काल भैरव – सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के अत्यंत शक्तिशाली रक्षक देवता।


नृसिंह – उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देवता।


हनुमान – भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाले देव।


गरुड़ – विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से रक्षा करने वाले देवता।


चामुंडा – तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी मानी जाती हैं।


प्रत्यंगिरा – अभिचार और काली शक्तियों का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।


नवदुर्गा – देवी के नौ रूप जो साधक और घर की रक्षा करते हैं।


कुबेर – उत्तर दिशा के रक्षक और समृद्धि के अधिपति।

नाग देवता – भूमि और पाताल से जुड़े अदृश्य रक्षक देवता।


तांत्रिक मान्यता के अनुसार इन देवताओं की कृपा से घर के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा ऊर्जा स्थापित हो जाती है।

घर के चारों ओर तांत्रिक रक्षा कवच बनाने की प्राचीन विधि

सबसे पहले घर या साधना स्थल को साफ और पवित्र करें। इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान की रक्षा की प्रार्थना करें।


अब घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम का छिड़काव करें। इसके बाद मुख्य द्वार पर खड़े होकर यह मंत्र 21 बार जप करें —


ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।


अब मन में कल्पना करें कि आपके घर के चारों ओर एक तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है जो पूरे स्थान को चारों ओर से घेर रहा है। यही ऊर्जा मंडल तांत्रिक रक्षा कवच माना जाता है।


यह प्रयोग कब किया जाता है

यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को किया जाता है। साधक लोग नई साधना प्रारंभ करने से पहले भी यह विधि करते हैं।


तांत्रिक परंपरा का रहस्य

तंत्र ग्रंथों में कहा गया है कि जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ स्वतः ही एक दिव्य रक्षक मंडल बन जाता है। ऐसे स्थान पर नकारात्मक शक्तियों, प्रेत बाधा और तांत्रिक अभिचार का प्रभाव बहुत कम हो जाता है।


नमामीशमीशान 

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🛡️ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता और प्राचीन 'रक्षा कवच' विधि! 🔱
(नकारात्मक शक्तियों और बुरी नज़र से अपने घर को कैसे सुरक्षित रखें, अंत तक पढ़ें)
तंत्र और आगम परंपरा के अनुसार, हमारा घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह सूक्ष्म ऊर्जाओं से भी प्रभावित होता है। प्राचीन काल में घर, मंदिर और साधना स्थल की रक्षा के लिए विशेष देवताओं की स्थापना की जाती थी और एक अभेद्य 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाया जाता था।
ग्रंथों में स्पष्ट है कि जहाँ वास्तु पुरुष, काल भैरव और क्षेत्रपाल की कृपा होती है, वह स्थान एक अदृश्य सुरक्षा चक्र से घिर जाता है और वहाँ कोई भी नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती। 🚫👻
✨ घर की रक्षा करने वाले 10 गुप्त तांत्रिक देवता: ✨
१. क्षेत्रपाल: किसी भी भूमि और क्षेत्र के मुख्य रक्षक देवता।
२. काल भैरव: सम्पूर्ण दिशाओं के प्रहरी और तंत्र के सबसे शक्तिशाली रक्षक!
३. भगवान नृसिंह: उग्र रूप से साधक और घर की रक्षा करने वाले देव।
४. हनुमान जी: भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाले।
५. गरुड़ देव: विष, सर्प और अदृश्य बाधाओं से बचाने वाले।
६. माँ चामुंडा: तंत्र में अत्यंत उग्र और रक्षक देवी।
७. माँ प्रत्यंगिरा: काले जादू (अभिचार) और शत्रु बाधा का नाश करने वाली गुप्त तांत्रिक देवी।
८. नवदुर्गा: देवी के नौ रूप, जो हर दिशा से साधक के परिवार की रक्षा करते हैं।
९. कुबेर देव: उत्तर दिशा के रक्षक और सुख-समृद्धि के स्वामी।
१०. नाग देवता: भूमि और पाताल से जुड़े घर के अदृश्य रक्षक।
🔥 घर के चारों ओर 'तांत्रिक रक्षा कवच' बनाने की प्राचीन विधि: 🔥
आप स्वयं अपने घर को सुरक्षित करने के लिए यह सरल लेकिन अचूक प्रयोग कर सकते हैं:
🔹 पहला चरण: घर को अच्छी तरह साफ और पवित्र करें।
🔹 दूसरा चरण: पूर्व दिशा की ओर मुख करके दीपक और धूप जलाएँ और मन ही मन स्थान देवता से घर की रक्षा की प्रार्थना करें।
🔹 तीसरा चरण: घर के चारों कोनों में गंगाजल, हल्दी या कुंकुम (रोली) का छिड़काव करें।
🔹 चौथा चरण: अपने घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर इस मंत्र का 21 बार जाप करें:
👉 "ॐ कालभैरवाय क्षेत्रपालाय नमः।"
🔹 पाँचवा चरण: अब आँखें बंद करके यह कल्पना (Visualization) करें कि आपके घर के चारों ओर एक अत्यंत तेजस्वी प्रकाशमय ऊर्जा मंडल बन रहा है, जो पूरे घर को कवर कर रहा है। यही आपका 'तांत्रिक रक्षा कवच' है। 🛡️✨
🗓️ यह प्रयोग कब करें?
यह रक्षा कवच विशेष रूप से अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार को बनाना सबसे फलदायी होता है। कोई भी नई साधना शुरू करने से पहले भी साधक यही विधि अपनाते हैं।
🔱 तंत्र का परम रहस्य: 🔱
जहाँ भैरव, क्षेत्रपाल और वास्तु पुरुष की ऊर्जा जागृत होती है, वहाँ तांत्रिक अभिचार (काले जादू), प्रेत बाधा और बुरी नज़र का प्रभाव शून्य हो जाता है।
🚩 जय काल भैरव! 🚩
🚩 हर हर महादेव! 🚩

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